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Sunday, 4 November 2018

धन्वन्तरी जयन्ती

धन्वंतरि जयंती पर विशेष प्रस्तुति--

#ॐ_यत्रौषधीः #समग्मत_राजानः #समिताविव
#ॐ_शंखं_चक्रं_जलौकां_दधदमृतघटं_चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।
#सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक_परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥
#कालाम्भोदोज्ज्वलांगं_कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।
#वन्दे_धन्वंतरिं_तं_निखिलगदवनप्रौढदावाग्सधनवन्तरी।।

प्रिय सखा तथा प्यारी सखियों!!पूर्ण पुरुषोत्तम मेरे प्रिय- प्रियतम श्रीकृष्णचन्द्र जी की !!पूर्णिमा से!! शरद-पूर्णिमा से !!अमावस्या तक की यात्रा, अर्थात् उनकी अपनी प्रेयसी लक्ष्मी से मिलन की यात्रा!! अर्थात एक अप्रतिम वर-यात्रा!!

अर्थात् समुद्र-मंथन की यात्रा के अंतर्गत शरद-पूर्णिमा को चन्द्र की प्राप्ति , क्रमश: द्वादशी को कामधेनु, त्रयोदशी को "देव- वैद्य धनवन्तरी", चतुर्दशी को काली!! एवं अमावस्या को अमृतकुंभ-सह-लक्ष्मी के अवतरण की कथा आपने अवस्य सुनी होगी;!!

वैसे ईसा पूर्वकदाचित्  ४८००० वर्षों पूर्व अथर्ववेद के अंतर्गत एक लाख मंत्रों के आठ विभाग कर उपवेद के रूप में आयुर्वेद का संपादन "भगवान" धनवन्तरी ने ही किया था!!

जिस प्रकार भगवान वेदव्यास ने १८ पुराणों का प्राकट्य किया उसी प्रकार भगवान धनवन्तरी ने आयुर्वेद का प्राकट्य किया!!और इसी हेतु आप उन्हें "विष्णु- अवतार" की भी संज्ञा देते हैं।

उनकी वैदिक चित्रांकित वैशेषिक भूषा चतुर्भुजी है; !!शंख- चक्र, जतूका- औषधि और अमृत-कलश।

हे प्रिय!! धनवन्तरीजी के शिष्य अग्निवेश,अश्विनी कुमार, उनके शिष्य इन्द्र, इन्द्र के भारद्वाज!! तदन्तर पुनर्वसु- आत्रेय, भेल, जतु, पाराशर, च्यवन, हारित, क्षार, पाणि और काशीराज दिवोदास हुए,ऐसा परम्परागत गृंथों में प्राप्त होता है!!

महर्षि अग्निवेश ने #अग्निवेश_तंत्र" नामक ग्रन्थ का निर्माण किया, जो अब अप्राप्य है; उसी गृन्थ का संपादन "महर्षि चरक" ने किया जो चरक संहिता के नाम से विख्यात हुआ,!!

काशीराज दिवोदास ने ३५००० वर्ष पूर्व काशी में सर्वप्रथम "शल्य- चिकित्सा विश्वविद्यालय" की स्थापना की,और महर्षि विश्वामित्र के पुत्र और अपने शिष्य सुश्रुत को विद्यालय का प्राचार्य नियुक्त किया और आज ही के दिन "सुश्रुत" ने #सुश्रुत_संहिता" का लोकार्पण भी किया था।अर्थात ये एक अनुसंधान ग्रंथ हैं!!

इसी कारण लोक-व्यवहार में आज भी प्राचीन चिकित्सा पद्धति को आयुर्वेद और  एलोपैथिक प्रणाली को "आयुर्विज्ञान" ऐसा नाम दिया गया । पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार संसार की प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद है!! इसमें भी आयुर्वेद के मंत्र  यत्र-तत्र विकीर्णावस्था में उपलब्ध हैं,जैसे कि ऋ•१०•१७•६• में कहते हैं कि----

#यत्रौषधीः #समग्मत_राजानः #समिताविव ।।
#विप्र_स उच्यते_भिषग्_रक्षोहामीबचातन॥

मेरे प्रिय सखा तथा प्यारी सखियों!! मेरे पति एक अच्छे आयुर्वेदाचार्य हैं, पूरे  (कछाड)  में लोग उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। मैं आपको एक रहस्य की बात बताती हूँ--- एलोपैथिक दवाई होती है न, वह रोगों को दबा देती है---- #दबाई"  जैसे किसी घर में आग लगाकर खिडकी- दरवाजे बंद कर दें!! अंदर ही अंदर शरीर को जलाकर सब कुछ खोखला कर देती है।

वहीं  "आयुर्वेद" में "दवाई" नहीं होती "औषधि" होती हैं  वे "ओज" और" धि: " अर्थात् -- बुद्धि को, धैर्य को, सहनशीलता को बढा देती हैं!!रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढा देती हैं, ओज + धी: = औषधि !

और वैसे भी!! हम हिन्दुओंके प्रत्येक पर्व!!विशेषार्थी होते हैं -यह पर्व अपने प्रियतमजी को धन्यवाद देने के एक अवसर होते हैं। प्यारी सखी ! सद्व और असद्व दोनों ही विचारधारा, आस्तिक- नास्तिक, ज्ञानी- भक्त, बुद्धिवादी साँख्य, देव और असुर इनमें श्रेष्ठ कौन है ?

इसका निरूपण करने की अपेक्षा यह जानना ज्यादा उत्तम है कि इन दोनों ने ही मिलकर #समुद्र_मंथन" किया और आज भी कर रहे हैं, और मंथन होने पर हलाहल विष और अमृत दोनों ही निकलेंगे और हमें तो बस --

#साधू_ऐसा_चाहिये_जैसा_सूप_स्वभाव।
#सार_सार_को_गहि_रहे_थोथा_देहि_उडाय।।

हे प्रिय!! चरक संहिता एवं सुश्रुत द्वारा दो सम्प्रदाय मान्य हैं ---
१• चरक द्वारा -- आत्रेय सम्प्रदाय और
२• सुश्रुत द्वारा -- धनवन्तरी सम्प्रदाय।
इसी कारण इसे आप्तोपदेश भी कहते हैं अर्थात् आप्त, दु:खी, पीडित जनों के लिये संदेश!! अशांत जनों के लिये संदेश।
#पेशंट' अर्थात् जिसकी शाँति #पे "हो गयी हो!! नष्ट हो गयी हो।

प्यारी सखी ! कहते हैं कि --
#इतिहासपुराणाभ्यां_वेदं_समुपब्रंहयेत"

अश्विनी कुमारों को,भगवान धनवन्तरी को!! #अश्विनी नामक पक्षी के दो पंख कहे गये हैं --
अर्थात विज्ञान के व्यावहारिक एवं सैद्धान्तिक दोनों ही पक्षों को ये संज्ञा दी गयी है!!

अब यदि पक्षी का एक पंख टूट जाये तो वह व्यर्थ हो जाता है, ऋग्वेद के औषधि• सूक्त•१०•४७•  में औषधियों के स्वरूप, उनकी उपलब्धता, शल्य चिकित्सा आदि का विस्तृत वर्णन आपको प्राप्त हो सकता है। कहते हैं कि #आथर्वण अर्थात महर्षि #दधीचि से इन्होंने प्राग्विद्या और मधुविद्या भी प्राप्त की थी!!

यह "प्राग्विद्या" ही "शल्य" और "मधुविद्या" ही "औषधि"  चिकित्सा के रुप में जानी गयी।
यही भगवान धनवन्तरी के दो पंख है।

#विप्र_स_उच्यते_भिषग्_रक्षोहामीबचातस् और इसी के साथ आपको धन्वन्तरी जयन्ती की शुभकामनायें देती हूँ!! आपकी  #सुतपा!!

आप नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करके मेरे समूह #दिव्य_आभास से भी जुड़ सकते हैं-
https://www.facebook.com/groups/1858470327787816/

इसके अतिरिक्त आप टेलीग्राम ऐप पर भी इस समूह से अर्थात दिव्य आभास से जुड़ सकते हैं!! उसकी लिंक भी मैं आपको दे रही हूँ-
https://t.me/joinchat/AAAAAFHB398WCRwIiepQnw

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Friday, 2 November 2018

गौ चारण

पर्व श्रृंखला के अंतर्गत विशेष प्रस्तुति--

#गाय_ऑक्सीजन_ही_लेती_है_और_ऑक्सीजन_ही_छोडती_है।।

                ।।गौ-चारण दिवस पर विशेष प्रस्तुति।।

मेरे प्रिय सखा तथा प्यारी सखी!!आप सभी को मेरे "प्रियतम- साँवरे" जी के महास्नान की, महापर्व की बहुत-बहुत शुभकामना। मेरे कान्हा जी को गायों से अत्यंत ही प्रेम है। हमारी संस्कृति के २४ अवतारों में "राम-कृष्ण" की गाथा! उनका चरित्र! उनकी एक-एक कथायें एक एक मिथक की स्थापना करती हैं।

कामधेनु ने आज मेरे प्रियतम का अभिषेक किया था!!मैं आपको आज के पर्व पर मात्र इतना ही कहना चाहती हूँ कि गाय हमारी संस्कृति का प्रतीक है,!! हमारे राष्ट्र ही नहीं!!#गाय_विश्वकी_आत्मा_है।
#गावोहि_विश्वमातरम्"

गौ, गंगा, तुलसी, सूर्य, चन्द्र साक्षात परमेश्वर के प्रतीक हैं। गौ पशु नहीं है, तुलसी पौधा नहीं है, और गंगा नदी नहीं है। इनसे इतर भारतवर्ष की कल्पना ही व्यर्थ है।

#जहाँ_सिंह_बनगये_खिलौने_गाय_जहाँ_माँ_प्यारी_है।
#जहाँ_सबेरा_शंख_बजाता_लोरी_गाती_शाम_है।
#हर_बाला_देवी_की_प्रतिमा_बच्चा_बच्चा_राम_है।"

मेरी प्यारी सखी!!आज मेरे देश में! मेरे कान्हा जी के देश में!! जो गौ वंश पर अत्याचार हो रहा है!! जो मेरी माँ के प्रति उसके ही पुत्रों द्वारा घृणास्पद व्यवहार हो रहा है,!! उसकी निंदा तो क्या करूँ!! मेरे शब्दकोष में इसके लिये शब्दों का ही अभाव है।

आप "#चरक_संहिता" पढें, गाय के गोबर से, गोबर के स्वरस से हैजा और मलेरिया दूर हो जाता है। लीवर और उदर विकार,अर्श, वातार्श,नाना प्रकार के चर्मरोग, सर्दी- जुकाम, रक्त विकार गौ मूत्र के सेवन से १००% ठीक हो जाता है।

आप "हमदर्द" की "साफी" पी सकते हैं, लेकिन गौमूत्र नहीं! आखिर क्यों?

मैं आपको एक रहस्य की बात बताती हूँ-- गाय को अभी भी "#सिक्खसमुदाय" द्वारा हमसे ज्यादा आदर की दृष्टि से देखा जाता है!!और सबसे ज्यादा सुखी और समृद्धशाली मेरे सिक्ख भाई ही हैं।
आज के दिन मेरे पिया जी ने "गौ-चारण" आरम्भ किया था। कहते हैं कि--
#सर्वेदेवा_स्थिता_देहे_देवमयी_हि_गौ:"

गाय के गोबर में लक्ष्मी, मूत्र में भवानी, थनों में समुद्र, उसकी ध्वनि में प्रजापति, नेत्रों में सूर्य-चन्द्र और उसके चरणों के अग्रभाग में देवताओं का निवास है। गाय के मुख में चारों वेद, दोनों सिंगों में शिव और विष्णु, कानों में अश्विनी कुमारों का वास है। गाय के रोम-रोम में दिव्यता का  निवास है।

हे प्रिय!!क्या आप जानते हैं कि गाय की रीढ में  स्थित "#सूर्यनाडी" सूर्य की किरणों के द्वारा गौमूत्र, गौमय और गौदुग्ध में सुवर्ण कणों का निर्माण करती है!!एक गाय अपने जीवन काल में ४१०४४० मनुष्यों के एक समय का भोजन दे सकती है,!! किंतु उसका माँस मात्र ८० लोगों को!!

वैज्ञानिक कहते हैं कि गाय ऑक्सीजन ही लेती है और ऑक्सीजन ही छोडती है।
गाय के !!१ग्राम गोबर में ३०० करोड जीवाणु होते हैं!! गाय के १० ग्राम घी से हवन करने पर १ टन ऑक्सीजन बनती है!!

कभी-कभी मैं यह भी सोचती हूँ कि जैसे आज #रामजन्म_भूमि कम से कम पिछले ३० वर्षों से एक
ज्वलंत राजनैतिक मुद्दा बनते बनते धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है!!

और बिलकुल वैसे ही आजादी के बाद के कुछ वर्षों में
गो हत्या प्रतिबंध बिल्कुल ही ऐसा ज्वलंत मुद्दा था!!
और मैं यह भी आज आपको बता रही हूँ कि --

भारत की पूरी संसद में "सम्पूर्ण गौ वध पर प्रतिबंध का विधेयक" सर्व समर्थन से पारित होने की मंजूरी हो चुकी थी, किंतु हमारे तद्-कालीन महान् प्रधानमंत्री बच्चों के #चाचा_जवाहरलाल_नेहरू ने कह दिया कि यदि यह विधेयक पारित होता है तो मैं प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दूँगा।

और आज रामजन्म भूमि,गो हत्या अथवा अनेक भारतीय संस्कृति के ज्वलंत मुद्दों की आड़ लेकर बनी सरकारें भी गो-रक्षकों के विरूद्ध ही खड़ी दिखती हैं!!आगे फिर कभी, आप स्वयं ही समझदार हैं।
आपकी #दीदी_सुतपा!!

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Sunday, 2 September 2018

श्रीकृष्ण जन्म

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अंक~२

#वे_तो_मुझ_दुराचारिणी_को_भी_अपनी_शरण_में_लेने_को_उत्सुक_हैं!!

#विक्रीडितं_व्रजवधूभिरिदं_च_विष्णो:,
          #श्रध्दान्वितोेनुश्रुणुयादथ_वर्णयेद्_य:।
#भक्तिं_परां_भगवति_प्रतिलभ्यकामं
            #हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण_धीर:।।

मेरे प्रियसखा तथा प्रिय सखियों!!अब निबंध को आगे बढाती हुयी मैं आगे आपसे चर्चा करती हूँ!!ये जो #मध्यस्थ होता है, #न्यायाधीश होता है!!वह #निश्पक्ष भी होता है।और उसकी सत्ता पर प्रश्न-चिन्ह लगाना मेरे जैसी निरंकुशों को सबसे आसान लगता है!!मैं तो सोचती हूँ कि कर्म तो मैंने किये हैं!! क्या किये और क्या नहीं किये!! उचित अथवा अनुचित किये!!ये तो मैं जानती हूँ बस!!

किन्तु ये मेरा शरीर साक्षात #व्रजभूमि है!!जिसमें मेरे प्रियतमजी रहते हैं!!दिल के झरोखों से मेरी सभी अच्छी-बुरी क्रियाओं और विचारों को अहर्निशा देखते रहते हैं!! यह मैं मूर्खा भूल जाती हूँ!!आप विचार तो करें भला मुझसे छुपकर मैं कोई कर्म या विचार कर पाऊँगी ?

हे प्रिय!! मैं आपसे एक बात कहूँ!!राम और कृष्ण का जन्म किस युग में कब और कहाँ हुवा था!! इसे तो छोड़ो किन्तु ये तो सच है न कि आपका और मेरा जन्म तो हुवा ही है!!और किन्ही परस्पर माँ-बाबा ने ही इस पिण्ड को जन्म दिया है!!और उन्हें मेरे-आपके दादा-दादी ने जन्मा!! ये एक पूरी सृष्टि की परम्परा है!!तो सृष्टिकर्ता आप ही हो!! तो राम-कृष्ण भी आप ही हो!!

बस इसमें थोड़ा सा अंतर है!!मैं रावण और पूतना जैसी हूँ और आप राम और कृष्ण जैसे!!ये अंतर तो है ही न!!अन्यथा मैं निकृष्ट कर्मों और आप श्रेष्ठ कर्म भला क्यूँ करते!! तो मेरे जैसे पापी प्रवृत्तियों की जो होंगी वे भला राम-कृष्ण को क्यों मानेंगी!! किन्तु आप चूंकि राम हो अतः मेरी दुष्ट सत्ता को तो देखोगे ही!!

अर्थात आप ही सर्वस्व हो!!वही दृष्टा भी होता है,साक्षी भी वही होता है,लेकिन मेरे साथ एक समस्या हमेशा होती है,कि मेरे विपक्ष में तो ठीक ही है-अगर पक्ष में भी फैसला होता है!!तो भी मुझे उसमें कुछ न कुछ अधूरा पन लगता ही है, इस कारण आपके निर्णय या आपके अस्तित्व पर ही मैं प्रश्न चिन्ह लगा देती हूँ!!

श्री भगवान कहते हैं कि मेरा जन्म दिव्य है--यह किसी साधारण शिशु का जन्म नहीं है,लौकिक जन्म नहीं है,किसी सचेत मांस-पिण्ड का जन्म नहीं है।
यह "अलौकिक" है!!ये एक ऐसा भेद है आपमें और मुझमें कि जैसे कि कोई धनाढ्य एक घोषणा करता है कि मेरे पास जो भी आयेगा मैं उसे १० ००० ₹ दूँगा!! अब ये तो निश्चित ही है कि यदि वो धनाढ्या मैं हुयी तो आने वाले याचकों में यदि कोई मेरा शत्रु हुवा तो उसे कदापि नहीं दूँगी!!किन्तु आप-

#अपि_चेत्सुदुराचारो_भजते_मामनन्यभाक्।
#साधुरेव_स_मन्तव्यः #सम्यग्व्यवसितो_हि_सः।।
ये मेरे प्रियतमजी ने •गी•९•३०•में कहा है!! वे सबसे प्रथम मुझ जैसी दुराचारियों पर कृपा करते हैं!!हाँ प्रिय!!यही सत्य है कि उनकी दृष्टि अपनी पापाचारिणी संतानों पर सबसे ज्यादा रहती है!! आप जैसे तो उनके समीप हो ही!! किन्तु वे तो मुझ दुराचारिणी को भी अपनी शरण में लेने को उत्सुक हैं!!किन्तु मोहिता तो मैं हूँ!!

#नासूयन्_खलु_कृष्णाय_मोहितास्तस्य_मायया।
#मन्यमाना_स्वपार्श्वस्थान्_स्वान_स्वान्_दारान्_व्रजौकस:

एक अलौकिक बात और-कृष्ण-प्राकट्य- #रोहिणी" नक्षत्र में होता है #वृश राशी में होता है,और योग-माया #राधिका"!!
#पूजन_करूँ_मैं_तेरा_वृषभानु_भानु_नंदिनी!!
यह दोनों ही "वृश"- #वृशभ धर्म के प्रतीक हैं।
और मध्य रात्री में अवतरण होता है,कहते हैं कि-
कृष्ण अवतरण अष्टमी मध्य रात्री १२ बजे हुवा!
श्री राम अवतरण नवमी मध्यान्ह १२ बजे हुवा!!
इतनी समानता!!इतना सामञ्जस्य  ?

तो इसमें भी कुछ विशिष्ट भेद निहित है!!भगवान आगे कहते हैं कि मेरा कर्म भी दिव्य है, अलौकिक है,एक बात याद रखना सखियों!!
श्री राम के जीवन चरित्र का अनुसरण करने से कल्याण होगा!
श्री कृष्ण के वचनों का अनुसरण करने से कल्याण होगा!

#मेरे_राम_मर्यादा_पुरूषोत्तम_हैं_और_कान्हाजी_लीला_पुरूषोत्तम!!
जिनका-अवतरण,कर्म,वचन तीनों ही दिव्य हों, अलौकिक हों!!
और कर्म का दिव्य होना अपने आपमें एक चुनौती है,कृष्ण चरित्र का प्रत्येक आयाम अपने आप में अलौकिक है।

श्री कृष्ण की विश्व समाज के लिए सकारातमक भुमिका,योग का साँसरिक कल्याण के लिए उपयोग, तथा इसी रुप मे महर्षि वेदव्यास संकलित "मानवजाति के कल्याण के लिए महान ग्रंथ भगवद्गीता का स्मरण!!
#ब्रम्हरात्र_उपावृत्ते_वासुदेवानुमोदिता:।
#अनिच्छन्त्यो_ययुर्गोप्य: #स्वगृहान्_भगवत्प्रिया:।।

प्यारी सखि वृंद!!आज "जन्माष्टमी"के पर्व पर मैं अपने नियमित निबंधों के स्थान पर इस निबंध श्रृञ्खला को प्रस्तुत कर रही हूँ!!- #सुतपा

श्रीकृष्ण जन्म

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अंक~१

#एक_तीसरा_रिश्ता_भी_होता_है_जिसे_मैं_जल्दी_स्वीकार_नहीं_कर_पाती!!

मेरे प्रियसखा तथा प्यारी सखियों!!कल मेरे प्रियतमजी का प्राकट्योत्सव है,,भाव-विभोर हुयी मैं बावली सी हो रही हूँ,,जिसे कभी देखा नहीं!!उसी की हो गयी हूँ!और प्रातःकाल से ही उन्हें ही अपने अंतःकरण में ढूँढ रही हूँ---

#अजोऽपि_सन्नव्ययात्मा_भूतानामीश्वरोऽपि_सन्।
#प्रकृतिं_स्वामधिष्ठाय_सम्भवाम्यात्ममायया।।
मैं जानती हूँ कि उन्होंने कहा है कि-मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति  को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।।

किन्तु फिर भीइस छोटी सी निबंध श्रृंखला के द्वारा #अवतरण" जैसे प्रगल्भित विषय पर कुछ कहना मूढता ही होगी,फिर भी!!
सखियों!! मैं #प्रकृति" #हूँ,जबतक #मैं हूँ,तब तक तो प्रकृति ही रहूँगी-सर्वप्रथम यहाँपर मैं"योगमाया" पर कुछ प्रकाश डालने का प्रयास करती हूँ--
#निज_माया_निर्मित_तनु_माया_गुण_गोपाल"

"योग"जुड़ने को कहते हैं न!!और जब मेरे प्रियतम!! #अजन्माजन्म"धारण करते हैं,तो इस संदर्भ में  प्रकृति को अधीन करने का तात्पर्य प्रथम स्पष्ट कर दूँ!!मैं आपसे एक रहस्य की बात कहूँ!!
मेरे प्रियतम की "१६१०८" पटरानियाँ थीं!
आपके शरीर में "१६१०८" नाडियाँ होती हैं!
"१+६+१+०+८=१६=  १+६=७
"सतो-रजो-तमो"ये तीन गुण और -पृथ्वी,जल,तेज,वायु ये सात तत्व और आठवाँ!!आकाश यह अष्टधा प्रकृति है। और यही "मैं" हूँ!!

और मैं ही कृष्ण की अष्ट-महारानियाँ हूँ!!किन्तु!!
सखियों--यह-"योग-माया" इनसे पृथक राधा रानी हैं,यही तो #महद्_तत्वातीत_शक्तित्व है।

राधा-रानी मेरे प्रियतमजी की लौकिक अर्धाड़्गिनी नहीं हैं!वे तो #सर्वाड़्गिनि हैं। मैं आपको एक बात और भी कहती हूँ!!जन्म लेने और प्रकट होने में जो अंतर है उसे लौकिक बुद्धि से समझने में समस्या आती है।
आप गीतोक्त भगवद् शब्दों पर ध्यान दें-
#ईश्वर_यही_स्वर-----#शब्द_ब्रम्ह!!

हे प्रिय!!स्त्री-पुरुष के सहयोग से जो उत्पत्ति होती है,जिस पिण्ड का निर्माण होता है,उसकी क्रमशः एक विकाश और विनाश की प्रणाली है,प्रक्रिया है!!

और फिर भी आपको एक रहस्य भरा सत्य बताती हूँ-आपने मेरे प्रियतमजी के अनेक चित्र देखे होंगे!! बाल्याऽवस्था के,किशोराऽवस्था के,युवाऽवस्था के यहाँ तक कि प्रौढाऽवस्था के भी चित्र देखे हो सकते हैं!!
और कभी आपने राम का,कृष्ण का,बुद्ध का, वृद्धाऽवस्था का चित्र देखा है ?
कदापि नहीं,ऐसा चित्र बनाने की कल्पना कोई चित्रकार कर ही नहीं सका आज तक के इतिहास में,ऐसी धृष्टता करने की हिम्मत ही नहीं हो पाती!!

कभी आज तक के इतिहास में किसी ने यह कहा कि "राम,कृष्ण,बुद्ध,महावीर,राधिका,सीता"कोई तो वृद्ध हुवे होंगे ? तो यह देखो!!ऐसे दिखते थे --वे बुढापे में।
लेकिन ऐसा हुवा ही नहीं!कभी वे बूढे हुवे ही नहीं,तो कोइ कल्पना कर भी कैसे सकता है  ?

#वासना_और_संस्कारों" की समष्टि से जिस पिण्ड का निर्माण होता है वह वासना और संस्कारों के कारण वृद्ध भी होगा-और मर भी जायेगा।लेकिन!! जो प्रकट होता है!! एक बात और-

#शत्रु_मित्र_मध्यस्थ_तीन_ये_मन_कीन्हैं_बरियाई।
#त्यागन_गहन_उपेक्षणीय_अहि_हाटक_तृण_की_नांई।।

मैं अपने जीवन में दो चीजें महेसूस की हूँ,दो प्रकार के रिश्ते संसार में देखे हैं,-
(१)- जिनसे हमारे स्वार्थ पूरे नहीं होते,जो हमारी सही-गलत बात को नहीं मानते,जो हमारी क्षत्ति करने की सोचते हैं,निंदा करते हैं हमारी!!उन्हें मैं अपना शत्रु मान लेती हूँ ।
(२)- जो मेरे प्रशंसक होते हैं,मुझसे कुछ लेना चाहते हैं,जिनके स्वार्थ मुझसे जुडे होते हैं,मेरे स्वार्थ जिनसे पूरे होते हैं-उन्हें मैं मित्र मान लेती हूँ।

और एक तीसरा रिश्ता भी होता है,!!जिसे मैं जल्दी स्वीकार नहीं कर पाती,-
"मध्यस्थ"का--न्यायाधीश"का,"नियामक" का
लेकिन वह!! मुझे स्वीकार करता है--
#जन्म_कर्म_च_मे_दिव्यमेवं_यो_वेत्ति_तत्त्वत:।
#त्यक्त्वा_देहं_पुनर्जन्म_नैति_मामेति_सोऽर्जुन ।।

हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं!! इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर को त्यागकर फिर  जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है।

और प्रिय!!मैं जानती हूँ कि इस मध्यस्थ, निरपेक्ष सम्बन्ध को अथवा अस्तित्त्व को मैं नकारती अथवा स्वीकारती क्यूँ हूँ!!वैसे एक बात मैं और भी कहूँगी! जैसे कि मैं कोई अपराध करती हूँ!! और पकड़ी जाती हूँ तो मुझपर केस तो चलेगा ही!!और केस के लिये मैं न्यायालयों का चक्कर भी लगाऊंगी!! और फिर वकील,पुलिस वाले मुंशी लोगों के शोषण का शिकार भी मैं अवस्य ही होऊंगी!!

और इन मन्दिरों को ही न्यायालय मैं मान बैठी हूँ!!
और पुजारियों को मैं अपना वकील बना लेती हूँ!!
मैं ने सोच रखा है कि ये स्तोत्रादि का पाठ करना ही संविधान की पुस्तकें हैं!!चलो ठीक है!! ये भी मान लो आप!! तो ये भी तो आपको मानना पड़ेगा न कि मन्दिरों में जाने वाले लोग कहीं न कहीं से #अपराध_बोध_से_ग्रसित_हैं अथवा कि नाना सम्पत्तियों के अधिकारों के लिये संग्राम लड़ रहे हैं!!

शेष अगले अंक में लेकर उपस्थित होती हूँ #सुतपा"