Showing posts with label अंक~५. Show all posts
Showing posts with label अंक~५. Show all posts

Wednesday, 12 September 2018

दुर्गा सप्तसती सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र

दुर्गा सप्तसती सिद्धकुञ्जिका-स्तोत्र~मंत्र~४ अंक~५

#पूर्व_पीठिका_ईश्वर_उवाच।।
#गोपनीयं_प्रयत्नेन_स्व_योनि_वच्च_पार्वति।
#मारणं_मोहनं_वश्यं_स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌।
#पाठ_मात्रेण_संसिद्धिः #कुञ्जिकामन्त्रमुत्तमम्।।
शिव कहते हैं कि हे शिवा!!इस "सिद्धकुञ्जिका- स्तोत्र" के पाठसे मारण,मोहन,वशीकरण,विद्वेषण, स्तम्भन तथा उच्चाटनादि सभी आभिचारिक उद्रेश्यों की सिद्धि प्राप्त हो जाती है!!

हे प्रिय!! जो पढे-लिखे शिक्षित और समझदार आप जैसे व्यक्ति होंगे वे तो इस सामान्य अर्थ को तत्काल ही अस्वीकार कर देंगे!! ये तो बिल्कुल ही असंभव है कि आप इस स्तोत्रका तोते की तरह पाठ करलो चाहे हजारों हजार बार कर लो और ये आपको सिद्ध हो जायेगा!!और फिर तो आप भगवान ही बन जाओगे!!

ऐसी अनर्थात्मक भ्रान्तियाँ फैलाकर ही तो तथाकथित भ्रष्ट तांत्रिक लोगों को लूटते फिरते हैं!!आपके अंध विश्वासका दोहन करते हैं!!आपको बेवकूफ बनाते हैं!! और साथ ही हमारी उत्कृष्टतम वैदिक सनातन शाश्वत और पूर्णतया वैज्ञानिकीय विधाओं को बदनाम करके रख देते हैं!!

जैसे लोगों ने ये अफवाह फैला रखी है कि कामाख्या की उपासिका भैरवी कामाख्या आनेवाले लोगोंको जिसे वे पसंद करती हैं उसे तोता बनाकर पिंजरे में कैद कर देती हैं!! हे प्रिय!!इन ढकोसलों और ऐसे झूटे तांत्रिकोंकी बातों भें आप कभी भी फंसना नहीं!! ये तो लुटेरे हैं जो कि कहते हैं कि हमें मारण-मोहन आदि विद्याएं आती हैं!! ऐसी कोई विद्या होती ही नहीं!! और यदि किसी के पास है तो वो मुझे मार कर दिखाये!!

हे प्रिय!!स्तोत्र में ऋषि कहते हैं कि- "पाठ-मात्रेण संसिद्धिः" इसका पाठ करने मात्र से ही- "कुञ्जिकामन्त्रमुत्तमम्"
ये सभी अभिचारादि कर्म सिद्ध हो जाते हैं!! पर किसे सिद्ध होते हैं ,यह प्रथम प्रश्न है ?
और किसके लिये सिद्ध होते हैं यह द्वितीय प्रश्न है ?
और दोनों ही यक्ष-प्रश्न अत्यंत ही महत्व पूर्ण हैं!!

आप जरा दु•सप्त•८•५४•के इस मंत्र को देखें-
#मच्छस्त्रपातसम्भूतान्_रक्तबिन्दूमहासुरान्।
#रक्तबिन्दोः #प्रतीच्छ_त्वं_वक्त्रेणानेन_वेगिना।।
देवी कहती हैं कि हे कालिके!! आप जरा अपने मुखको और फैलाओ- #विस्तीर्णं_वदनं_कुरू।।
और मेरे शस्त्रपातसे गिरनेवाले रक्तबिंदुओं और उनसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योंको तुम अपने इस उतावले मुखसे खा जाओ!!

और हे प्रिय!!अब ये कितनी हास्यास्पद बात है कि कुछ घृणास्पद तांत्रिक बकरे और मुर्गों के गले में दाँत गड़ाकर इस मंत्र के नामपर उनका जीवित ही रक्तपान करते हैं!! और हमारे आर्यसमाजी भाई तो इस मंत्र का अनर्थ कर सप्तशती की हंसी उड़ाते ही हैं!! ये दोनों समुदाय ही भटके हुवे हैं!!

मारण मंत्र किसे सिद्ध होते हैं,यह मेरा प्रथम प्रश्न था ?
मारना है किसे,किसे मोहित करना है,स्तंभन किसका करना है,किसे अपने वश में करना है,किस चीजसे उच्चाटन करना है, और किसका करना है  ?
आपका शत्रु कौन है ?
और आपका मित्र कौन है ?

हे प्रिय!!ये आत्म-संग्राम और आत्मरति की बातें हैं!!
#जो_बातें_सद्गुरु_मुखियन_की_ते_वेदन_मां_नांही।
#जहां_कबीरा_रम_रहा_तंह_वेदन_को_गम_नांहि।।
अब हास्यास्पद तो ये लगता है कि मेरे पौराणिक भाई भी कहते हैं कि इन कथाओं पर जैसे का तैसा ही विश्वास कर लो!! ऐसे ही महिषासुर,चण्ड,मुण्ड, रक्तबीजादि असुर रहे होंगे और ऐसे ही उनका वध भी देवी ने किया होगा!!

नहीं मेरे प्रिय!!ये कथानक नहीं हैं!!ये इतिहास नहीं हैं!!ये दृष्टान्तात्मक गंभीरतम योग सिद्धान्त हैं!! अब आप पुनश्च ध्यान दें!! मैं आपको उपरोक्त सिद्ध कुञ्जिकामन्त्र दिखाती हूँ-

"ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।।
ऊँ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं फट् स्वाहा।।"

और मैं इसे थोड़ा सा आपसे समझती हूँ-
#ऐंकारी_सृष्टिरूपाये_ह्रींकारी_प्रतिपालिका_क्लींकारी#कामरूपेण्य_बीज_रूपे_नमोऽस्तुते।।
और इस मंत्र के इस अर्थ से कोई भी विद्यावान व्यक्ति तो कभी भी असहमत नहीं हो सकता न ?

और इसी के साथ इस मंत्र का भावानुबोधन पूर्ण करती हूँ!!

Monday, 3 September 2018

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अंक~५

#ये_पथ_भेद_पर्वत_की_घाटियों_में_हैं_सर्वोच्य_शिखर_तो_एक_ही_है!!

मेरे प्रियतमजी को प्रिय सखा तथा प्यारी सखियों!! मेरी प्रतिज्ञा है कि मै किसी की नकल नहीं करती,अपनी जो सोच है वही कहती हूँ! "जब-जब धर्म को ग्लानी होती है" #धर्मो_धरा_धारकः"

और संत-महापुरुष ही तो इस पृथ्वी के दिक्-पाल हैं,उन्हीं की कारुणिक दृष्टि के कारण संसार स्थित है!!वे आधार स्तंभ हैं!! इस पृथ्वी के!!हो सकता है कि--
#शैले_शैले_न_माणिक्यम्_मौक्तिकम्_न_गजे_गजे।
#साधुनाम्_न_च_सर्वत्वम_कस्तूरम्_न_मृगे_मृगे।।"

#हर_गिरि_पर_संताप_नहिं_लोखन_नहिं_सर्वत्र।
#सुतपा_देखी_जगत_में_नहिं_दुश्चरित्र_सर्वत्र।।

किन्तु जब साधु-पुरुष ही भृमित होने और करने भी लगेंगे!!जब #वंदे_मातरम्_जनगणमन"का राष्ट्र-गीत गाने पर किसी का धर्म भ्रष्ट होने लगेगा!!जब अपनी मातृ-भूमि के रक्षार्थ अपने प्राण न्योछावर कर देने वाली मेरी सेना पर कुछ लोग प्रश्न-चिन्ह लगाने लगेंगे!!जब कालनेमि की बहुलता होने लगती है!!

तो ज्ञान और विवेक को ग्लानि होने लगती है,जब ज्ञानी- विवेकी-भक्त जनों की निंदा होने लगती है,तब-तब मेरे नाथ!!अवतरित होते हैं!!और आप जैसों के रूप में अवतरित होते हैं!!हे प्रिय!!मैं समझती हूँ कि दुनिया का कोई सा भी पंथ गलत हो ही नहीं सकता मुझे तो ऋग्वेद में कुरान की आयतें दिखती हैं!!और बाईबल में भी मैं गीताजी के उपदेश ढूंढती हूँ!! और फिर-

#साधू_ऐसा_चाहिये_जैसा_सूप_स्वभाव।
#सार_सार_को_गहि_रहै_थोथा_देहि_ऊड़ाय।।

सखियों!!आप महा-भारत कालीन चरित्रों को तो देखें-- कर्ण,द्रोणाचार्य,भिष्मपितामह,धृतराष्ट्र, विराट, शतानिक,अश्वत्थामा,द्रुपद,दुर्योधन,प्रद्युम्न,बर्बरीक,ये सभी महा-योद्धा मात्र ही नहीं थे-बल्कि महान विद्वान, तथाकथित शास्त्र ज्ञानी,सर्व विद्या सम्पन्न भी थे,पर!!
अविवेकी,अन्यायपथानुगामी,अन्याय के संरक्षक भी तो थे न ?

और यह द्वि-ध्रुवीय विचार-धारा जब-जब बढती है तो इनसे समाज को,नैतिक-मूल्यों के संरक्षण कि आवश्यकता -पूर्ति हेतु --मैं "वासुदेव"आत्म स्वरूप में अवतरित होता हूँ!यही हम सभी के भगवान की प्रतिज्ञा है-
#परित्राणाय_साधूनां_विनाशाय_च_दुष्कृताम्।
#धर्मसंस्थार्पनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे।।

साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिये, पाप-कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिये मैं  युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ!! हे प्रिय!! मैं आपको एक कहानी सुनाती हूँ,--

अशोक-वाटिका में त्रिजटा!!अशोक-वाटिका में त्रिजटा नें माँ सीता से पूछा!कि हे माँ!!आपके "राम"कहाँ-कहाँ हैं ?
तो सीता जी ने कहा कि मुझमें तुझमें,सृष्टि के कण-कण में मेरे राम हैं!!
तो त्रिखा कहती हैं कि!!रावण में भी हैं?
हाँ!!हैं न!!क्यों नहीं उसमें भी हैं।

तो त्रिजटा बोली!हे माँ!!अगर रावण में भी राम हैं,तो आप एक महा-पुण्य का काम कर दो!!
आप रावण को स्वीकार कर लो माँ!!तो राम वापस लौट जायेंगे,और न जाने कितने असख्ञ्य "राक्षस-वानर-रीक्ष"इस महा-युद्ध में मारे जाने से बच जायेंगे!!

तो सीता जी ने कहा कि-हे त्रिजटा!!मैं विश्व-संस्कृति की राज-माता हूँ!मैं जैसा करूँगी-उसी का अनुसरण आने वाली पीढियाँ भी करेंगी।ये हजारों-हजार राक्षस-वानर अगर मर भी गये तो फिर से जन्म ले लेंगे!!
किन्तु,सभ्यता,संस्कार और संस्कृति यदि एक बार मर गयी तो #बस_मर_गयी!!"वह फिर दुबारा जन्म नहीं ले सकती!!

हे प्रिय!!संसार के किसी भी कोने में प्रकट हुवे सभी महापुरुषों ने इन्ही आदर्श-मूल्यों की स्थापना हेतु प्रयास किया!!उनका मार्ग भिन्न-भिन्न हो सकता है!! वे हिंसक-अहिंसक किन्ही भी मार्गों से चल सकते हैं! किन्तु इतना निश्चित है कि उन्होंने अपने अनुयायियों को अंततः #योग_भक्ति_कर्म_अथवा_वेदान्त मार्गों का ही उपदेश दिया होगा!!

वैसे मैं एक बात पुनश्च कहूँगी कि पंथ अथवा संत गलत नहीं होते-
#आकाशाये_पतीतोयम_यदा_गच्छन्ति_सागराः।
#सर्वदेवो_नमस्कारम_केशवम_प्रति_गच्छति।।
आप किन्ही भी पथोंसे उस एक ही परमार्थ सत्ता को उपलब्ध होगे!!ये पथ-भेद पर्वत की घाटियों में हैं!! सर्वोच्य शिखर तो एक ही है!!

और उस शिखर पे आरूढ हुवे कोई वासुदेव ही आपको बुलाते हैं कि आओ-आप हमारे पास आओ!! किन्हीं भी पथ से आओ!! किन्तु इस अनन्त शिखर पर ही आप आओगे!! और हे प्रिय इसी के साथ इस श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के संदर्भ में प्रस्तुत श्रृंखला का उपसंहार करती हूँ!! #सुतपा!!

#आज_मैं_आपको_अपने_नवीन_ब्लाॅग_की_लिंक_भी_दे_रही_हूँ --
http://sutapadevididi.blogspot.com/2018/09/blog-post_2.html?m=1