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Tuesday, 6 November 2018

दीपावली

#दीपावली पर विशेष प्रस्तुति- अंक~२

#लक्ष्मी_का_कटि_प्रांत_ही_उत्पत्ति_स्थिति_और_लय_का_महासागर_है!!

#ऊँ_आद्य_लक्ष्म्यै_नम: #विद्यालक्ष्म्यै_नम:,
#सौभाग्य_लक्ष्म्यै_नम: #अमृत_लक्ष्म्यै_नम:,
#लक्ष्म्यै_नम: #सत्य_लक्ष्म्यै_नम: #भोगलक्ष्म्यै_नम:।

मेरे प्रिय सखा तथा प्यारी सखियों!! आज के दिन मेरे साँवरे जी ने #साकेत" में प्रवेश किया था !!
आज के दिन मेरे "साँवरे" जी ने भक्त प्रहलाद" का उद्धार किया था !!
आज के दिन मेरे "साँवरे" जी ने राजा "बलि" का उद्धार किया था !!
आज के दिन मेरे "साँवरे" जी के पथानुयायी "महावीर स्वामी ने निर्वाण प्राप्त किया था !!

इतनी सारी खुशियों को समेट कर आये इस पर्व पर!!
इसीलिये तो हम "गणेश- लक्ष्मी" का पूजन करते हैं,!!नूतन वर्ष का अभिनंदन करते हैं,!!किंतु इसके गर्भ में छुपी सच्चाई पर भी तो विचार करें।

मेरी एक सखी ने मुझसे कहा था कि दीदी आप हाथ देख सकती हैं न,!! आप देखो न ! मेरी शनि की साढेसाती चल रही है!!
तो मैं बोली कि--हो सकता है कि साढे सात साल चले भी,!! लेकिन राम की तो चौदह वर्षों तक चली थी।
राम जी को राज्य लक्ष्मी वनवासोपरांत मिली!!
प्रहलाद को भक्ति रूपी लक्ष्मी कठिन तपस्योपरांत मिली!!
राजा बलि को"अहर्निश सान्निध्य" महान त्यागोपरांत मिली!!
महावीर स्वामी को "कैवल्य" असीम साधना के उपरांत मिला!!

#गजाननम्_भूतगणादिसेवितं_कपित्थ_जम्बू_फलचारुभक्षणम्।
#उमासुतं_शोक_विनाशकारकं_नमामि_विघ्नेश्वरपादपंकजम्।।

सखियों इन गुणों के---- त्याग, भक्ति, साधना, वैराग्य रूपी गणपति के पूजनोपरांत ही तो आप लक्ष्मी का पूजन कर सकोगी न!!

गरूड वाहिनी लक्ष्मी की ही तो आराधना करनी है,!! अन्यथा उलूक वाहिनी लक्ष्मी तो सभी लोकों को नष्ट कर देगी मेरे- आपके !!
तभी तो "गुरू ग्रन्थ साहिब" में इसे #बंदी_छोड दिवस" के रूप में मनाने की परम्परा है।
और बीच में एक बात मैं और भी कहूँगी कि विश्व के इतिहास में हमारे सिख समुदाय ने ही युद्धोपरांत बंदी बनाये गये विपक्षी सैनिकों को मुक्त कर देने की अद्वितीय परम्परा का प्रावधान किया था!!

हे प्रिय!!ये अष्ट लक्ष्मी ही लक्ष्मी हैं। आद्य लक्ष्मी से ही सद्विद्या रूपी लक्ष्मी की प्राप्ति हो सकती है।और ---
मेरे साँवरे जी की योगमाया ही नारायणी रूपी आद्यशक्ति लक्ष्मी हैं!!

उनकी इस परा और अपरा दोनों विद्याओं का ज्ञान ही विद्या लक्ष्मी हैं।!!
इस परा और अपरा विद्या को जानने वाला ही सौभाग्य लक्ष्मी का पात्र होता है,!!
इस प्रकार का ज्ञानी ही सौभाग्यशाली "अमृत लक्ष्मी" को प्राप्त करता है।
इस प्रकार $मृर्त्योऽमाऽअमृतं_गमय" का यात्री ही "लक्ष्मी" अर्थात् मानव जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

और हे सखी ! वह सत्-पथानुगामी परमार्थ पथिक "सत्य लक्ष्मी" को ज्ञात करने वाला,!!
सभी प्रकार के "प्रारब्ध" से प्राप्त सुखदु:खादि को समभाव से भोग करते हुए "भोग लक्ष्मी" का सम्मान करते हुए "अन्नकूटस्थ लक्ष्मी" को प्राप्त हो जाता है,!!कूटस्थ भाव को प्राप्त हो जाता है।

#ॐ_या_सा_पद्मासनस्था_विपुल_कटि_तटी_पद्म_दलायताक्षी।
           #गम्भीरावर्त_नाभि_स्तन_भर_नमिता_शुभ्र_वस्त्रोत्तरीया।।
#लक्ष्मी_दिव्यैर्गजेन्द्रै_मणि_गज_खचितै_स्नापिता_हेमकुम्भैः।
         #नित्यं_सा_पद्म_हस्ता_मम_वसतु_गृहे_सर्व_मांगल्य_युक्ता।

कहते हैं कि यह नारायणी "पद्मासनस्था"  पद्म पर विराजमान हैं, यह वहीं स्थिर रह सकती हैं जहाँ इन्हें पद्मारूढ मैं देखूँ!!
"विद्या , तप, दान, यज्ञ, शील, गुण, धर्म, और सत्य जहाँ होगा-- वहीं यह अचंचला रहेंगीं।
"विपुल कटि तटि" इनका कटि प्रदेश (कमर- मध्य भाग) विपुल अर्थात् अनंत है,!!
यही परा और अपरा प्रकृति स्थान है।

अखिल ब्रह्माण्ड यह कटि प्रांत है। यह लक्ष्मी का कटि प्रांत ही "उत्पत्ति, स्थिति और लय" का महासागर है!!
इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए आगे कहते हैं कि "पद्मदलायताक्षि"

यह लक्ष्मी जी अपनी हजारों हजार आँखों से,!!
यह योगमाया, यह मेरी माँ ही अपनी हजारों हजार पद्मके समान आँखों से मुझे आपको, हमारे कार्य और विचारों को देख रही हैं --

"माँ" अपने पुत्रों के "संग- संस्कारों" की द्रष्टा हैं। वे तो यही चाहती हैं कि मेरी संतान विद्या प्राप्त कर तप करे!!
तप से प्राप्त फल का दान करें,!!
यज्ञ करें, शीलवान हों, गुणों को धारण करें,!!
अपने लिये प्रतिपादित श्रेष्ठ कर्मों को करें। सखियों तीन चीज ज्यादा समय तक छुपती नहीं -- "सूर्य, चन्द्र और सत्य", जो इनका,!!  सत्य का पालन करता है-- वही तो अपनी माँ की श्रेष्ठ संतान है --
शेष अगले अंक में #आपकी_सुतपा!!
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Monday, 5 November 2018

नर्कचतूर्दशी

#नर्कचतुर्दशी पर विशेष प्रस्तुति-- द्वितीय अंक

#मैं_सत्य_कह_रही_हूँ_कि_वेश्याओं_से_बड़ा_काम_विजेता_कोई_हो_ही_नहीं_सकता!!

मेरे प्रिय सखा तथा प्यारी सखियों!!जहाँ तक मेरी अपनी सोच जाती है तो मैं यह समझती हूँ कि नरकासुर की कैद में पड़ी उन स्त्रीयों में से किसी ने किसी प्रकार अपना संदेश तद्कालीन मेरे प्रियतम जी अर्थात श्रीकृष्ण जी तक पहुँचाने का प्रयत्न किया होगा!! और तब कृष्ण ने एक योजना बनायी होगी!!

मैं समझती हूँ की कोठों और आतंकवादियों की अभेद्य दीवालों को तोड़ना बड़ी-बड़ी सेनाओं के वश में भी नहीं हुवा करता!!आज भी मुँबई कमाठीपुरा,सी•पी•टैंक• के एसे अनेक कोठे हैं!! जिनपर जब पुलिस के छापे पड़ते हैं तो वे वहाँ कैद बच्चियों को छुपे मार्गों से निकालकर ले जाते हैं!!

अतः श्रीकृष्ण जी ने अपनी पत्नी #सत्यभामा के साथ मिलकर कोई ऐसी योजना बनायी होगी कि जिसके द्वारा एक सुँदर स्त्री होने के कारण सत्यभामा तो नरकासुर के अंतः पुर तक पहुंच कर उसका वध कर देती हैं!! और दूसरी तरफ अपने सैन्य बल के साथ कृष्ण ने नरकासुर के किले पर आक्रमण कर उसकी सेना को पराजित कर दिया!!

किन्तु हे प्रिय!! इस ऐतिहासिक कथा में एक अद्वितीय मोड़ तो तब आता है,जब उन १६००० कन्याओं को उसके बंदी-गृह से मेंरे प्रियतम जी ने मुक्त कराया होगा!! मैं उन सभी बलात्कार तथा लव जेहाद की भेंट चढ़ी और कोठों में रहने वाली नारियों को #कन्या ही मानती हूँ, क्योंकि स्वेक्षा से नहीं बल्कि मानसिक अथवा बल के प्रयोग द्वारा ही उनके कौमार्य को भंग करने की कुचेष्टा की गयी!!

और तब वे कन्याएं, जिन्हे समाज घृणा की दृष्टि से देखता है!! वे मेरे प्रियतम जी से पूछती हैं कि #हम_घृणित_कन्याओं_को_कौन_सा_समाज_आश्रय_देगा_कौन_हमें_अपनायेगा ?

हे प्रिय!! मोपला ,भारत के विभाजन,कश्मीरी पंडितों की बच्चियों, बंगलादेश,सोमालिया,की युद्ध त्रासदी पे तो सभी आँसू बहाते हैं!!और ये भी हमारा बुद्धिजीवी समाज कहता है कि इन युद्धों में लाखों-लाख स्त्रीयों के साथ सामूहिक बलात्कार हुवे!!उन्हें #सेक्स_ट्राय की तरह यूज किया गया!!

छोटे-छोटे बच्चों को पहाड़ों के उपर से फेंक दिया गया, वृद्धों को जीवित गाड़ दिया गया,युवाओं को या तो बंदी बनाकर मजदूर बना दिया अथवा की उनकी गर्दन रेत दी गयी!! किन्तु एक अनुत्तरित प्रश्न किसी भी देश के इतिहासकारों ने कभी नही इतिहास में बताया कि जिन बलात्कार की शिकार स्त्रीयों को बाद में बचाया गया अथवा जो बच गयीं!! #उनका_बाद_में_क्या_हुवा ?

हे प्रिय!! मैं अपनी इन्ही कलमुंही आँखों से कश्मीरी पंडितों,सिख औरतों,बंगलादेश की हिन्दू बच्चियों और वेश्यालयों की वेश्याओं को देखी हूँ जिनके शरीर को सिगरेटों से दागा गया, जिनकी जाँघों पर आततायियों ने #पाकिस्तान_पाईंदाबाद लिखा!! जिनके स्तनों को काट डाला गया!! जिनके ओठों को को नोच खसोट कर अमिट निशान छोड़ दिये गये!!

और वे आज भी असम,पश्चिम बंगाल, दिल्ली,अमृतसर,की गलियों में एकाकी और अभिशप्त जीवन जी रही हैं!! पहले तो उन्होंने अपनी पेट की आग बुझाने को अपने शरीर को दस-दस रुपयों में बेचा!! और फिर गंदी बिमारियों से तड़पती हुयी एक दर्दनाक मृत्यु को प्राप्त हो गयीं!!और प्रत्येक कोठे की वेश्या की आखिरी यही नियति होती भी है!!

ये सरकारें,राजनैतिक दल,विश्व न्यायालय,शोषल और प्रिंट मीडिया, सामाजिक और मानवाधिकार संगठन युद्धों के बाद उन्हें भूल जाते हैं!! तो हे प्रिय!! नरकासुर की कैद से मुक्त हुयी वे बेबस कन्याएं कृष्ण से कहती हैं कि हम कहाँ जायें ?
हमारा क्या होगा ?
हमें कौन अपनायेगा ?

और ये समाज जैसा आज है! वैसा ही कल भी था!!और कल भी ऐसा ही रहेगा भी!!! किन्तु कृष्ण जैसे महापुरूष और शाषक तो बिरले ही होते हैं!! तब मेरे प्रियतम जी ने कहा कि तुम्हे पति चाहिये या संरक्षक ?

और इस बहशी दरिन्दों के बीच वही स्त्री सुरक्षित रह सकती है जिसकी माँग में किसी शशक्त के नाम का सिन्दूर हो!!अन्यथा गरीब की पत्नी तो पूरे गाँव की रखैल कही जाती ही हैं!!उन स्त्रीयों ने तो देख लिया और भुगत लिया था कि बहशी हवश के भूखों की वासना क्या होती है!!हाँ!! मैं सत्य कह रही हूँ कि वेश्याओं से बड़ा काम विजेता कोई हो ही नहीं सकता!!

शारीरिक भावनायें तो उनकी मर चुकी होती हैं!!बारम्बार बलात्कारों की शिकार हुयी ये बिचारी तो अपने स्त्रीत्व को पल-पल धिक्कारती हैं!!और तब मेरे प्रियतम जी ने कहा कि चलो आज से तुम सभी मेरी हो!!उन्होंने उन अभिशप्त स्त्रीयों को राज्याश्रय दिया!! अपने संरक्षण में रखा!!

और तभी तो आज के ही दिन नरकासुर के नर्क से मुक्त हुयी उन स्त्रीयों ने आज मुक्ति के दीपक जलाये!!दीपमालिका से मेरे प्रियतम जी के नगर को सजा दिया!!हे प्रिय!! आज के दिन मैं आपका आह्वान करती हूँ कि चलो आप भी ये प्रतिज्ञा करो कि आप भी अपने सहयोग से किसी ऐसी #कृष्णप्रिया का उद्धार करने का प्रयास करोगे!!और इसी के साथ इस द्वि-अंकीय श्रृंखला को पूर्ण करती हूँ-- आपकी #सुतपा!!
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Tuesday, 11 September 2018

गोपिका गीत

#हमारी_निश्छल_भक्ति_के_सघन_वन_में_वृन्दावन_में_रमण_करने_वाले_हमारे_पिया_जी!
हे प्रिय!!पुनः इसके तृतीय श्लोक की विवेचना प्रस्तुत कर रही हूं--

#नवनीरजधर_श्यामलसुन्दर_चन्द्रकुसुमरुचिवेश_गोपीगणह्रिदयेश। #गोवर्धनधर_वृन्दावनचर_वंशीधर_परमेश।।३।।
मेरे प्रियतम् जी!!नूतन कमल!!के समान आप पर तो हम कीचण जैसी मलीन बुद्धि की गोपियों का बौद्धिक -जल छू भी नहीं पाता!! आप तो हम गोपिकाओं के इस ह्रिदय-सरोवर के एकमात्र नीलकमल हो!!पर हम भी तो आपकी ही मुरझायी हुयी कलियां हैं!! 

हे प्रिय!!आपने ही गीताजी•३•४३•में कहा है कि- #जहि_शत्रूं_महाबाहो_कामरूपं_दुरासदम्।।
हम तो कलियाँ हैं #आप_कामेश्वर_कामारि की! आप स्मरण तो करें,कमल के पुष्प के पुष्प-राग से ही तो कलियों की उत्पत्ति होती है!! मैं आपको एक बात कहूँ!!रुक्मिणी का कृष्ण के साथ बहुत गहरा मेल कभी हो ही नहीं सकता, क्यों कि उनके भीतर #पुरुषत्व है!! मेरे प्रियतम जी का किसी भी ऐसी स्त्री से बहुत गहेरा सम्बंध हो ही नहीं सकता जिसके भीतर थोड़ा सा भी पुरुषत्व हो!!अहंकार हो!मात्र सदैव बंधनाकाँञ्छिणी, अमूक्ता,चंचला,पूर्ण प्रकृति-स्वरूपा #ना_अरि_नारी ही से उनका सनातन सम्बंध संभव हो सकता है!!क्यों कि वे पूर्ण पुरुषोत्तम हैं।
#उत्तमः_पुरूषष्त्वन्यः_परमात्मने_तु_दाह्यतः।।
#यो_त्रय_लोको_मार्वर्त्य_विभर्त्यः_व्यय_ईश्वर।।

सम्पूर्ण समर्पण ही उनसे मिलन का हेतु बन सकता है प्रिय!! इससे कम वे लेंगे नहीं, और इससे ज्यादा कुछ हो सकता ही नहीं। और एक रहस्यमयी सच्चाई ये भी है कि वे मुझसे मुझे ही माँग कर पूनश्च मुझको अधूरे #मैं से सम्पूण #मैं बना देते हैं!!मुझे समूची की समूची लौटा देते हैं!!तभी तो मैं कभी-कभी गुनगुनाती हूँ कि-
#मुझको_मुझी_से_चुरा_लो_दिल_में_मुझे_तुम_बसा_लो_खो_ना_जाऊँ_फिर_कहीं_मैं_पास_आओ_गले_से_लगा_लो!!और हे प्रिय इसी_कारण सत्यभामा, जाम्बवन्ती, रुक्मिणी आदि•१६१०८•परिणिता स्त्रीयाँ पीछे रहे गयीं और #अपरिणिता_राधा आगे आ गयीं!

हे प्रिय! #कुमूदिनी_कली_ही_कमल_बना_करती_हैं!! जिनका उल्लेख शास्त्रों में है!! जो इस पद की शास्त्रीय अथवा सामाजिक रूप से दावेदार थीं। सब की सब धीरे-धीरे भागवत् के पन्नों में खोती चली गयीं और एक रहस्य की बात आपको बता दूँ कि जिस शख्सियत का नाम भागवत् महाभारत आदि गंथों में है ही नहीं वे #राधा सबसे आगे मेरे प्रियजी के भी आगे #राधा_कृष्ण_बन_गयीं!! हे प्रिय!! सत्यभामादि से मेरे पियाजी ने विवाह किया था,एक संस्थागत विवाह बनकर रह गये वे रिश्ते । किंतु #राधा से,गोपियों से,मीरा-बाई से;और मुझसे भी उनका संबंध प्यार का था,है और रहेगा भी!! शास्त्रों, स्मृतियों,सभ्यताओं,समाजों अथवा या फिर अदालतो से जिनके लिए हक मिल सकते थे!!

हे प्रिय!!जो कृष्ण से अपना हिस्सा मांग सकती थीं, वे #कात्यायनी की तरह खो गयीं, और #राधा,गोपियाँ धीरे-धीरे प्रगाढ़ होती चली गयीं और आज वह समय आ भी गया है कि रुक्मिणी भूलती जा रही हैं!और मेरे प्रियतम जी के साथ राधा का नाम;गोपीयों का नाम ही रह गया। तभी तो वे कहती हैं कि-हे नीलमेघ की तरह आभा वाले घनश्यामजी!! आप तो ऐसे प्रकाशपुञ्ज! हैं,मानों कि चन्द्रमा ही एक पुष्प की तरह हमारे अन्धकार मय ह्रिदय-सरोवर में खिल उठा हो!! हे हम गोपिकाओं के ह्रिदयेश!! आपने तो हमारी रक्षा के लिये पूरे गोवर्धन पर्वत को भी उठा लिया था!!

हे गोवर्धनधर!!आप आज इतने निष्ठुर भला कैसे हो सकते हो ? कि हम #सबलाओं_को_अबला बनाकर मंझधार में छोड दिया!!हे हमारी निश्छल भक्ति के सघन वन में #वृन्दावन_में रमण करने वाले हमारे पिया जी!!हम आपकी बंशरी हैं!!हे हम बंशी रूपी यन्त्रों के यान्त्रिक!! हे बंशीधर!! हे हमारे परमाराध्य!! हमारे परमेश्वर!! आओ न!!अब क्यूं तड़पाते हो।

हे प्रिय!!  इसी के साथ इस पद्यांश का भावानुवाद पूर्ण करती हूँ!!
गोपिकाविरहगीतम् -४

#राधा_कृष्ण_एक_वृत्त_हैं_एकही_रस्सीके_दो_छोर_हैं

हे प्रिय!!आज पुनः #श्रीगोपिकाविरहगीतम् के संशोधित संस्करण मैं मेरे प्रियतमजी"के श्रीचरणों में अपनी मोहित बुद्धि से इसके चतुर्थ अर्थात् अंतिम श्लोक का भावानुवाद प्रस्तुत कर रही हूँ--

#राधारञ्जन_कंसनिषूदन_प्रणतिस्तावकचरणे_निखिलनिराश्रयशरणे_एहि_जनार्दन_पीताम्बरधर_कुञ्जे_मन्थरपवने।।४।।

हे "राधारंञ्जन"!!!एकआप ही तो हैं जिनके मधुर स्नेह से राधिका जी के ह्रदय को आनंद प्राप्ति होती है "अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं आह्लादकारी भावना है यह! आप सोचें तो एकबार!! सांसारिक सम्बन्धों में कोई भी स्त्री या पुरुष अपने जीवनसाथी का किसी अन्य से रिश्ते को एक छण भी सहन नहीं कर सकता पर इन गोपियों का महाभाव!! कि उन्होने राधिका जी को महारानी बनाया और स्वयं को उनकी दासियां मानती हैं यह अहैतुकी निःस्वार्थ प्रेमकी पराकाष्ठा है!!

और हे प्रिय!!इसका कारण है की #राधा ने सब कुछ छोड़ दिया मेरे कृष्ण के लिए, #कृष्ण_राधा कहते आपने कभी और किसी को भी सुना नहीं होगा!! #राधा_कृष्ण, #सीता_राम ही सभी कहते हैं, अतः जो सब कुछ समर्पण कर देती हैं, वह सब पा लेती है। जो बिलकुल नेपथ्य में खो जाती हैं,जो सीता की तरह सहर्ष अग्नि-पथ से गुजर जाती हैं!!जीवित ही भूमि में समा जाती हैं- वे बिलकुल आगे हो जाती हैं।

गोपियाँ कहती हैं कि हे नाथ!!आप जिस लिये मथुरा गये थे,वह काम तो हो गया- कंसनिषूदन!!कंस का वध तो आप कर ही चुके!!अब तो आप आ ही जाओ, हम गोपियों का ह्रदय आपके श्री चरणों में प्रणय- निवेदन करता है!!हे प्यारे!!पूरे ब्रह्माण्ड में आपके अलावा हमारा कोई सहारा नही हैं,हम आपकी दासियां निराश्रया हैं!!

हे प्रिय!! राधा, गोपियों के बिना कृष्ण के अस्तित्व की कल्पना भी आप नहीं कर सकते!! ये गोपियाँ- राधिका ही उनकी सारी कमनीयता हैं। ये ही मेरे प्रियतम जी की- #अस्तित्त्वानुभूति_अकारणकरूणावरूणालया_का_अलौकिक_भाव_है, यह सब जो है, जो “महत्वपूर्ण है, वही तो गोपियाँ,मीरा अथवा राधिकाभाव हैं।

हे प्रिय!! मैं उनके गीत,उनके नृत्य की घुंघरू,उनकी मुरली,प्रिया,चितवन आदि-आदि जो कुछ भी  राधा उनके भीतर #स्त्रित्व है वह सब मैं ही हूँ । अतः भैं और वे एक हो गए, #राधाकृष्ण हो गए। क्यों कि राधाकृष्ण होते ही जीवन के दोनों विपरीत ध्रुव मिल गए-अतः मैं तो कहती हूं कि यह भी मेरे कृष्णजी की पूर्णताओं की एक पूर्णता है।

हे प्रिय!! राधा-कृष्ण एक वृत्त हैं एक ही रस्सीके दो छोर हैं!!आप अधूरा नहीं समझ सकते कृष्ण को, अलग सोचकर वे रिक्त और भयानक हो जाते हैं। #महाकाल हो जाते हैं,सब रंग खो जाते हैं!! सृष्टि नष्ट हो जाती है!!

हे प्रिय!!मेरे कृष्ण का सारा व्यक्तित्व प्रकाशित है राधा की ऐषणा पर। चारों तरफ से राधिका भाव उन्हें अपने आगोश में समेट कर उन्हें- #मधुराधिपते_रऽखिलम्_मधुरम् बनाता है!!वह इसी में खिल उठते हैं। मेरे प्रियजी नीलकमल हैं!! राधा उनकी जड़ हैं। वे एक हैं। आप उनको अलग नहीं कर सकते। यही तो युगल-सरकार है।

हे प्रिय!! जैसे आप रात के तारों की कल्पना नहीं कर सकते  अंधकार के बिना, अमावस में तारे बहुत ही उज्जवल होकर दिखाई पड़ने लगते हैं, बहुत शुभ्र हो जाते हैं, दिन में भी तारे होते हैं–पूरा आकाश तारों से भरा पड़ा है अभी भी,किंतु  सूरज की किरणों में तारे दिखाई नहीं पड़ सकते।

हे प्रिय!! तभी तो गोपियाँ कहती हैं कि-हे जनार्दन!! जब आप थे-पवन के साथ लहेराता हुवा आपका पीत पीताम्बर हम अनाथिनियों के सर का आश्रय बनजाता था,हम सनाथ थीं !!हे नाथ!!हे पीताम्बर धर!!अभी भी मन्थर गति से पवन तो इस वन में चल रहा है पर हम अनाथिकाओं को सनाथ करने वाला वह पीताम्बर ही नहीं है!! #वितर_वीर_स्तेऽधरामृतं अब तो आप हमें अपने अ-धरामृत् का पान करा ही दो प्रियतमजी!

हे प्रिय!! इसी के साथ इस पद्यांश तथा गोपिका विरह गीत का भावानुवाद पूर्ण करती हूँ,!! #सुतपा!!

Monday, 10 September 2018

सिद्ध कुजमञ्जिका

सिद्धकुञ्जिका-स्तोत्र~मंत्र~२~१ अंक~२

#आप_इसमें_समर्थ_हो_आप_मुझे_रूप_विजय_यश_दो_मेरे_काम_क्रोधादि_शत्रुओं_को_मिटा_दो!!

      ।।गुप्त-नवरात्रि पर विशेष प्रस्तुति।।

हे प्रिय!! अब पुनः मैं इस अप्रतिम स्तोत्र रत्न का यथा-शक्ति तत्वार्थ मेरे प्रियतम जी श्री रास-रासेश्वर कान्हा जी के युगल चरणों में निवेदित करने के प्रयासान्तरगत इस श्रृंखला का द्वितीय पुष्प प्रस्तुत करती हूँ-
" पूर्व-पीठिका-ईश्वर उवाच।।
#न_कवचं_नार्गलास्तोत्रं_कीलकं_न_रहस्यकम्‌।
#न_सूक्तं_नापि_ध्यानं_च_न_न्यासं_च_न_चार्चनम्।।
हे प्रिय!!पुनश्च शिव कहते हैं कि-हे शिवा!! सिद्धकुञ्जिका-स्तोत्र का पाठ करने हेतु "कवच, अर्गलास्तोत्र,कीलक,देवी-रहस्य,देवीसूक्तं,ध्यान अथवा न्यासादि करने की और न ही अर्चना करने की ही आवस्यकता है!!

मैं आपको इस संदर्भ में भी कुछ कहना चाहती हूँ!!जैसे कि सप्तशती के प्रारम्भ में देवी कवच में कहते हैं कि-
यद्_गुह्यम्_सर्वम्_लोके_सर्व_रक्षा_करम्_नृणाम।।
हे प्रिय!!आप जरा अपनी बुद्धि तो लगायें! ! लगभग सभी स्तोत्रादिकों में यही आपको पढने को मिलेगा कि यह गुप्त है!!इसे किसी को बताना मत!! वेदादि गृंथों को भी किसी अपात्र को पढने न दें!!तांत्रिक गृंथों के रहस्यों को कभी किसी के सामने प्रस्तुत न करें!! इन्हे बिल्कुल छुपा कर गोपनीय रखें!!

और फिर भी वेद,शास्त्र,उपनिषद,सप्तशती,सभी तांत्रिक गृंथ,गूढतम-गृंथ लाखों लाख की संख्या में छपते हैं और कौणियों के दाम में बिकते हैं!! फुटपाथ पर भी बिकते हैं!! रद्दी के भाव में भी बिक जाते हैं!! तो क्या इन गृंथों के रचयिता जो त्रिकाल-दर्शी तथा महान ऋषि गण थे!! वे इस कड़वी सच्चाई को नहीं जानते होंगे कि ऐसा भी होगा  ?

मैं आपसे पूछती हूँ कि क्या इन पुस्तकों को बैन कर देना चाहिये ?
इनके प्रकाशकों को आप मना कर दोगे ?
इनका वितरण आप रोक सकते हैं ?

और आप याद रखें कि इसी #गुप्त_गुप्त_गुप्त_ज्ञान की रट लगाकर तथाकथित ढोंगी तांत्रिकों के जाल में फंसकर नित्य ही कोई ना कोई विभत्स घटना घटित होती ही रहती है!! जैसे कि अभी दिल्ली में घटी घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है!!

अतः हे प्रिय!!मैं यह नहीं कहना चाहती कि ये #गुह्य शब्द शास्त्रादिकों में प्रक्षेपित हैं!!मैं मात्र इतना ही कहना चाहती हूँ कि पात्र-अपात्र का अन्वेषण ज्ञान स्वयम ही कर लेता है!!जैसे कि लाखों नहीं करोड़ों निबंधादि प्रतिदिन शोषल मीडिया पर आते हैं!!पर आप मेरे निबंध खोज ही लेते हैं!! और करोड़ों लोगों के सामने ये होते हुवे भी वे इसकी तरफ देखते भी नहीं!!

#कवच विशिष्ट सुदृढ तथा कष्टभेद्य बख्तर को कहते हैं!!जैसे कि शिरस्त्राण,जूते,कड़े ,या आप कह लें कि बुलेट प्रूफ जैकेट!! जैसे कि जब विश्वामित्र जी के यज्ञों को आसुरी शक्तियाँ भृष्ट करने लगीं!!तो वे #राम_लक्ष्मण की रक्षा में यज्ञ करने लगे!! वैसे ही प्राचीन काल से ही श्रेष्ठ और अत्याऽवस्यक कार्यों के संपादन हेतु कुछ व्यवस्थायें की गयी हैं!!

हे प्रिय!!जैसे कि वी•आइ•पी•,वी•वी•आइ•पी•, सांसद, विधायक,संसद आदिकी सुरक्षा हेतु सुरक्षा बल लगादिये जाते हैं!!वैसे ही इन "कवचों"का पाठ करके अपने शरीर के विभिन्न अंगों में नाना देवताओं को काल्पनिक रूप से अपने रक्षणार्थ आह्वाहन करके कहा जाता है,जैसे कि-
#नासिकायां_सुगन्धा_च_उत्तरोष्ठेच_चर्चिका।
#अधरे_चामृतकला_जिव्हायां_च_सरस्वती।।

अब आप इसी का भावानुवाद समझ लें!!
मैं अपनी नासिका से दिव्य देवार्पित गंध ही लूँगी!!
मेरे उपरके ओंठ प्रियजी के नाम लेने हेतु ही खुलेंगे!!
मेरे अधर सदैव उनके चरणामृत का ही पान करेंगे!!
मेरी जीभ से सदैव ज्ञानमयी वार्ता ही होगी!!
मैं ऐसी प्रतिज्ञा कर लूँ!!और इसका पालन भी करूँ!! यही "कवच"धारण करना है!!

और हे प्रिय!! #अर्गला अर्थात जैसे कि-
#प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने_चण्डिके_प्रणताय_मे।
#रूपं_देहि_जयं_देहि_यशो_देहि_द्विशो_जहि।।
आदि-आदि!!नाना प्रकार से दिव्य शक्तिओं से प्रार्थना करना कि आप मेरी दुष्ट भावनाओं को मिटा दो!!आप इसमें समर्थ हो!!आप मुझे रूप,विजय,यश दो!! मेरे काम-क्रोधादि शत्रुओं को मिटा दो!!

और #कीलक अर्थात #कुंञ्जी के विषय में मैं पूर्व अंक में बता ही चुकी हूँ!!तथा प्राधानिक,वैकृतिक तथा मूर्ति रहस्यादि अर्थात यदि संक्षेप में कहूँ तो-
फिर भी मुझे इसके लिये आगे आपसे चर्चा करनी ही होगी!!

हे प्रिय!!इस प्राधानिक रहस्यके एक श्लोक को देखें-
#तप्तकाञ्चनवर्णाभा_तप्तकाञ्चनभूषणा।
#शून्यं_तदखिलं_स्वेन_पूरयामास_तेजसा।
माँ महालक्ष्मी ने सम्पूर्ण जगत को शून्य-स्वरूप ही देखकर केवल तमोगुणरूप उपाधिके द्वारा एक उत्कृष्ट रूप धारण किया।।

हे प्रिय!!अब आप ही विचार करें कि,सप्तशती के ऋषि स्वयम ही कहते हैं कि यह जो महालक्ष्मी का कल्पित स्वरूप है!!धन,ऐश्वर्यादि ये सभी के सभी तमाऽच्छादित हैं!!इनको प्राप्त करना अथवा न भी करना!!अंततः शून्य परिणाम ही देता है!!ये व्यर्थ हैं!! आप इन्हे प्राप्त करने हेतु सांसारिक भौतिकीय उद्यम तो करो!!किंतु देवी से इनकी भीख मत माँगो!!

अभी इस श्लोक का भावानुवाद अधूरा है!! शेष अगले अंक में पुनः प्रस्तुत करूँगी!! #सुतपा!!