Thursday, 20 December 2018

भक्तिसूत्र~७

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-७

#आप_जिससे_प्रेम_करते_हो_उसको_अपनी_प्यारी_से_प्यारी_वस्तु_देनेंमें_कभी_जराभी_नहीं_सोचते!

मेरे प्रिय तथा प्यारी सखियों!!वैदिक साहित्य की ह्यदय स्पर्श कर लेने वाली श्रृञ्खला के अन्तर गत मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र के  सातवें सूत्र- पुष्प को चढा रही हूं--------

#सा_न_कामयमाना_निरोधरूपत्वात्" ।।७।।
परम प्रेम रूपा भक्ति कामना रूपी नही है,क्यों कि वह निरोध स्वरूपिणी है।

हे प्रिय!!नारद जी आगे कहते हैं कि, एक बार आपका चित्त सांसिरिक विषयों से हट जायेगा तो फिर वह कामनाओं को नहीं करेगा ऐसा मात्र भक्ति मार्ग पर चलने वालों के लिये ही संभव है।क्यों कि भक्ति समर्पण करती है!!कुछ भी उसका प्रत्यूपकार नहीं चाहती।

वासना और प्रेम में यही अंतर होता है,,जहाँ वासना अपने सुख की पूर्ति-मात्र करना जानती हैं!इसे अन्य के सुख से कोइ भी लेना-देना नहीं है!!और वहीं-
आप जिससे प्रेम करते हो, उसको अपनी प्यारी से प्यारी वस्तु देनें में कभी जरा भी नहीं सोचते।और फिर परम प्रेम!!मैं एक बात बताती हूँ आपको!!

आप ने एक माँ को देखा होगा!!कहीं भी,कभी भी जब उसके छोटे से बच्चे को भूख लगती है न!!तो वह कहीं भी हो सब लाज-शर्म को छोडकर अपने बालक को तुरंत स्तन-पान कराने लगती है।उसकी दृष्टि में--
"न।कामयमाना" #अपने_शिशुकी_क्षुधा_पूर्ति_से_बडी_कोई_भी_वस्तु_पूरी_सृष्टीमें_हो_ही_नहीं_सकती।

#सबै_रसायन_हम_पिया_प्रेम_समान_न_कोय।
#रंचन_तन_में_संचरै_सब_तन_कंचन_होय।।

संसार के जितने भी रिश्ते हैं वे शुद्ध ब्यापार पर टिके हुवे हैं-और! यह आज ही ऐसा हो रहा है ऐसा! बिल्कुल भी मत समझना!!दुनिया पहले भी वैसी ही थी -जैसी कि आज है!!मैं आपको बस एक बात इस सन्दर्भ में कह सकती हूं कि-----

आप!!मेरे निबंध को पढो या ना पढो,,यह तो आपके वश की बात है!इसमें मैं तो कुछ भी नहीं कर सकती,, लेकिन!!मैं अपने प्रियतम के लिये लिखूं, इसी बहाने ही सही-उनके विषय में सोचती रहूं!!यह तो मेरे वश की बात है न!क्या-आप इससे मुझे रोक सकते हो ?

"न मैं आपको जबरदस्ती पढने को कह सकती हूं-न आप मुझे लिखने से रोक सकते हो"!!बस इस सूत्र को ऐसे ही समझना होगा।मैं !!तो सृष्टि के कण कण में ब्याप्तअपने प्रियतम जी के लिये!!खाती हूँ,पिती हूँ,सोती हूँ,जागती हूँ,सोचती हूँ,पढती हूँ,लिखती हूँ।
मैं जो-जो भी कर्म करती हूँ!!बस !!!उनके लिये करती हूँ तो फिर!!

इसमें ,मेरी अपनी कोइ भी कामना तो है ही नहीं!!
मेरी कामना---तो श्री कृष्णा!!!के सुख,उनकी प्रशन्नता, उनके पावन नाम का प्रचार,,उनकी राह देखती सखियों को उनके प्रियतम से मिलाने की है!!क्यों कि --

#सखि_हौं_स्याम_रंग_रंगी।
#देखि_बिकाइ_गइ_वह_मूरति_सूरति_माँहि_पगी।।
#संग_हुतो_अपनो_सपनो_सो_सोइ_रही_रस_खोई।
#जागेहु_आगे_दृष्टि_परै_सखि_नेकु_न_न्यारो_होई।।

प्रिय सखा वृँद!नारदजी कहते हैं कि #निरोधरूपत्वात् भक्ति में निरोधनाम्कता है! #विरोधका_नितांत_अभाव #सर्वस्व_समर्पण!जो आप जैसे भक्त होते हैं!!वो किसीका विरोध करनेकी स्वप्नमें भी कल्पना नहीं करते!!वस्तुतः उनकी दृष्टिमें-

#चतुरार्यसत्यानि_दुःख_समुदय_निरोध_मार्गाश्चेति।।
सुख-दुःख, दुःख समुदाय (दुःखों का कारण) सभी का निरोध हो चुका!!

भक्तोंकी दृष्टिमें #राम_कृष्ण_बुद्ध_महावीर_शैब्य #शाक्त_वैदिक_अवैदिक_आस्तिक_नास्तिक जैसी कोई बात ही नहीं रहती!! आप उनका विरोध करेंगे या समर्थन इससे उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता!! वस्तुतः जब भक्त और भगवानके मध्य अवरोध ही न हो!तो वो सदैव अविरल भावसे उनमें ही रत रहते हैं!! वे निर्विरोध हो जाते हैं!!

हाँ प्रिय!!यही अमृत-स्वरूपा भक्ति है, भक्ति-सूत्र का!शेष अगले अंक में!! आपकी #सुतपा!!
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भक्तिसूत्र-६

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-६

#जीवन_में_जो_भी_आपको_स्त्री_मिली_वो_स्वप्न_सुँदरी_से_बेकार_है!!

हे प्रिय तथा मेरी प्यारी सखियों!! देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र के अगले सूत्र को प्रस्तुत कर रही हूं।आप सबके ह्यदय में स्थित मेरे प्रियतम श्री कृष्ण जी के चरणों में इसके प्रथम अध्याय की पहली आह्लिक का छठवाँ सूत्र-पुष्प चढा रही हूं--

#यज्ज्ञात्वा_मत्त_भवति_स्तब्धो_भवति_आत्मारामो_भवति।।६।।

प्यारी रस स्वरूपिणी सखियों!!देवर्षि नारद जी आगे कहते हैं कि- "यज्ज्ञात्वा मत्त भवति।तेन ज्ञानफलं भक्ति फलं प्राप्ते योगाभ्यासफलं तथाश्च" अर्थात  जिन्होंने प्रियजी को पा लिया उन्होंने ज्ञान का फल  योग का फल भी पा लिया!!उनकी सभी इन्द्रियाँ स्वक्ष और तृप्त हो गयीं!!

हे प्रिय!!जो आपकी तरह तृप्त हो गये और परिणामतः जिनकी इंद्रियां स्वच्छ हो गईं-स्वस्थ हो गयीं!!इसे भी मैं आपसे समझने की कोशिश करती हूँ-- #स्वच्छेन्द्रिय_अर्थात_इंद्रियों_से _दुश्मनी ?

इनको तोड़ना,प्रताणित करना, इंद्रियों को सताना, मिटाने की मिथ्या कोशिश करना! किसी भी भांति इंद्रियों से मुक्त होने का स्वप्न देखना!! भक्ति-सूत्र  कहता है कि यदि  इंद्रियां स्वच्छ हो जायेंगी तो और भी संवेदनशील हो जायेंगी!!

प्यारे सखा वृंद!! भक्ति और ज्ञान का फल तो और भी अद्भुत है,भक्ति-सूत्र का कोई पर्याय मनुष्य क्या किन्ही भी लोकों के इतिहास में है ही नहीं,यदि इन सूत्रों को मै आपसे समझ लेती हूँ तो फिर कुछ समझने को शेष नहीं रह जाता है!!

इस भक्ति सूत्र के एक-एक सूत्र में एक-एक वेद समाये हैं!! वेद खो जायेंगे तो भी कुछ नहीं खोयेगा, हे प्रिय!!! किंतु यदि #भक्ति_सूत्र खो जायें तो सब कुछ खो जायेगा। #योगाभ्यास का फल है स्वच्छेन्द्रियाँ! भक्ति का फल है जिसकी इंद्रियां स्वच्छ हो गईं, जिसके नेत्र स्वक्ष हो गये!!

मैंने कभी किन्ही कथा वाचक से सूरदासजी की कथा सुनी थी!!मैं नहीं मानती कि वो सच होगी!! एक सुँदर स्त्री को देखकर उन्होंने आंखें फोड़ लीं ?
इस भय से कि आंखें गलत रास्ते पर ले जाती हैं ?
हे प्रिय सखा!! यदि सूरदासजी ने ऐसा किया हो तो वे सूरदास हो ही नहीं सकते।

ये तो पोपा-पण्डितों ने कहानी गढ़ डाली है!!उनकी बुद्धि ऐसी ही रही होगी। आंखें फोड़ लेने से भला स्त्री के रूप से छुटकारा मिल जायेगा ?
रातको सपनों में तो आंखें बंद होती ही है, तब!! क्या स्त्री के रूप से छुटकारा हो जाता है ?
स्त्री तो और भी रूपवान हो कर प्रगट होगी,वो अप्सरा बन कर आपको सतायेगी!!

हे प्रिय सखा!स्वप्न में जैसी सुंदरियाँ होती हैं! फेसबुक पर मेरी जैसी स्त्रियां,लड़कियाँ होती हैं! उनकी प्रोफाइल फोटोज् को आप देखें!! वैसी कहीं जागते हुवे आपने देखीं ?

यही तो आभासी संसार की समस्या है कि सपने में मिल जाती हैं!!गूगल,फेसबुक,शोषल मीडिया पर मिल जाती है किंतु वास्तविक संसार में नहीं मिलतीं।

और जीवन में जो भी आपको स्त्री मिली वो स्वप्न- सुँदरी से बेकार है! या मुझ जैसी को जो स्वप्न में राजकुमार मिला वो कामदेव सरीखा पुरुष यथार्थ जीवन में मुझे मिले पती की अपेक्षा वो मुझे ज्यादा लुभायेगा।

इसीलिए मैं अपने पती से और वे मुझसे कभी भी तृप्त हो ही नहीं सकते!!  "मत्त भवति" मत्त,उन्मत्तावस्था को कहते हैं,,और सांसारिक दृष्टि से पागलों को उन्मत्त कहते हैं, आप गाडीवान रैक्व,जड-भरत, विदूषी गार्गी,ऋषि मतंग, शबरी बाई,केवट,सुकरात, फिरदौस,मीरा बाई, चैतन्य महाप्रभू,रामकृष्ण परमहंस जैसे संतों का इतिहास, जीवनचरित्र पढो!!आपको पहली दृष्टि में वे सब पागल ही लगेंगे!! क्योंकि उनकी दृष्टि में लौकिक कर्म सब ढोंग हो जाते हैं।

आप गोपी चरित्र पढें,आप यह समझ ही नहीं पायेंगे कि ये पागल नहीं तो क्या हो सकती हैं ?
वे लताओं, वृक्ष,पत्थरों,और बृज की मिट्टी से लिपट कर कहती हैं कि यही तो मेरे कान्हाँ हैं!!वे एक दूसरी का आलींगन करते हुवे कहती हैं कि-यही तो मेरे कृष्ण हैं!!मेरे प्रियतमजी हैं!!दुनिया इसे पागलपन कहती है! लेकिन यही उन्मत्तता है!! अहोभाव है,अरी सखि !!

#प्राण_कण्ठ_चलि_आय।
#अब_तो_जीवन_धन_बिनु_जीवन_कैसेहु_रहि_न_सकाय।
#उचकति_चौंकति_बकति_तकति_कछु_पुनि_पुनि_मुरछा_आय।
#ऐसी_हूक_उठति_हिय_पुनि_पुनि_मनहु_प्राण_अब_जाय।
#है_कोउ_प्राणसखी_लै_प्रानन_प्राणनाथ_मिलवाय ?
#अब_कृपालु_पिय_आन_मिलो_न_तु_होइहि_तोरि_हँसाय।

"स्ततब्धो भवति" हे प्रिय!!वह स्तब्ध हो जाता है!!मूक हो जाता है,!--जब ईशू-मसीह को सूली पर चढा रहे थे,सुकरात जहर पी रहे थे,संत हरिदास,और मंसूर फकीर की चमणी उधेणी जा रही थी--तो वो एकदम शान्त थे!!,,,क्यों यह एक अद्भुत रहस्य है!गोपनीय सत्य है!!

"सा आत्मारामो भवति आत्मने आत्मना तुष्टो ---
जो अपनी आत्मा में अपनी आत्मा से ही संतुष्ट हो चुका है!!जिसके लिये!! एक बात बताती हूँ!!एक सत्य!!साधारण सा!!आप किसी शहर में घूमने जाते हो,एक होटल में रुकते हैं!!दो-चार दिन के बाद जब आप उस होटल को छोडते हैं!! तो क्या आपको उस होटल से कोइ मोह हो सकता है!!नहीं न!!कभी नहीं हो सकता-

#राम_का_नाम_लेकर_जो_मर_जायेंगे,
#नाम_दुनिया_में_अपना_अमर_कर_जायेंगे।
#ये_पूछो_न_पूछो_है_खुशी_आपकी,
#हम_मुसाफिर_हैं_लौट_कर_अपने_घर_जायेंगे।।

जो आत्म स्वरूप में निमग्न हो गया,आत्मा-राम हो गया,अपनी आत्मा में ही रमण करने लगा!! वह उन्मत्त हो गया!स्तब्ध हो गया!!आत्मा-राम हो गया।
हाँ प्रिय!! यही अमृत-स्वरूप है भक्ति का!
शेष अगले अंक में!!आपकी #सुतपा!!
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भक्तिसूत्र~५

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-५

#जब_विषय_भोगकी_इच्छा_ही_शेष_नहीं_रही_तो_फिर_विचार_कैसा ?

प्रिय सखियों!!मैं पुनः अब आप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का पंचम सूत्र प्रस्तुत कर रही हूं।आप सबके ह्यदय में स्थित मेरे प्रियतम श्री कृष्ण जी के चरणों में इसके सूत्र-पुष्प को चढा रही हूं--

#यत्प्राप्य_न_किंचिद्वाञ्छति_न_शोचति_न_द्वेष्टि_न रमते_नो_त्साही_भवति।।५।।

हे प्रिय!!दिव्य ऋषि नारद जी कहते हैं कि!! भक्ति जब ह्यदय में प्रविष्ट हो जाती है तो अन्य किसी भी वस्तु की आकाञ्छा ही बिल्कुल समाप्त हो जाती है।
मैं एक बात बताती हूँ,आप अपने कमरे में एक गिलास पानी जमीन पर गिरा दो ,आप देखोगे कि वह जिधर ढाल होगी उधर की ओर अपने आप बहता चला जायेगा,जल का स्वभाव ही है ढलान की तरफ बढना,इसके लिये उसे किसी के साथ की आवश्यकता है ही नहीं।

मैं यही कहना चाहती हूँ कि,हम सभी आनंद घन महासागर के अंश हैं!!आप आनंद स्वरूप हैं, और भक्ति- आनंद की असीम लहेर हैं!!बस एक बार! आपको !!जैसे ही इस अमरत्व  अहो भाव की अनुभूति हुयी इसके बाद तो बस!! सब ईच्छायें न जानें कहाँ खो जायेंगी,कोइ इच्छा बचेगी ही नहीं,!!
मैं तो जब भी अपने कान्हा जी को देखती हूँ!!तो बस !! एकटक देखती ही रह जाती हूं ,किसी वस्तु की इच्छा ही शेष नहीं रहती,।मन में!! निर्विचार!! क्यूं,,----

विषयों का ध्यान करने से उन्हें प्राप्त करने का विचार आता है,जब विषय भोग की इच्छा ही शेष नहीं रही तो फिर विचार कैसा!! "#न_शोचति" गीता जी में कहते हैं कि--
#सड़्गात_संजायते_कामः_कामात्_क्रोधाभिजायते

हम किसी पर क्रोध क्यूँ करते हैं ,हमें किसी से ईर्ष्या  क्यों होती है!!द्वेश,जलन क्यों होती है- यह तभी तो होगी जब उसके पास कोइ ऐसी चीज हो!!जो मेरे पास न हो।जब मैं अखिल ब्रम्हाण्डाधिपति की हो गयी!! तो अब तो सब कुछ मेरा ही है न!!

#न_रमते_नोत्साहीभवति"
हे प्रिय!!लो,आज आपको एक कहानी सुनाती हूँ!! सिकंदर विश्व विजय के लिये जा रहा था ,निकलने के पहले वह वहाँ के प्रसिद्ध संत #अरस्तू" का आशिर्वाद लेने गया,,तब अरस्तू!!एक पेड के नीचे लेटे हुवे थे,उन्होंने पूछा कहाँ जा रहा है ?

सिकन्दर ने कहा--दुनिया को जीतने जा रहा हूँ,,रोम,इटली,अफ्रिका,रूस,पुर्तगाल,भारत,समेत पूरी दुनिया को जीत कर उस पर राज करूंगा!!
अरस्तू बोले कि उसके बाद!!! -क्या करेगा ?
सिकंदर बोला कि फिर !!फिर!!! क्या करूंगा ?
बस आराम करूंगा !!और क्या!!
अरस्तू हंस कर बोले कि इतना सब कुछ करने के बाद तू जो करेगा- मै वही आराम अभी से कर रहा हूँ।

जब भक्ति भीतर!! बहूत भीतर!!उतर जाती है तो बस !!अरस्तू की तरह न किसी अन्य काम में आप रमते हो!!न ही किसी कार्य को करने का उत्साह ही शेष रहता है।तब तो आप जो भी करते हो।वह मेरे प्रियतम के लिये करते हो #स्वान्तः_सुखाय" करते हो!! "#सर्वजन_हिताय" करते हो!!!!हाँ प्रिय  यही प्रेम-स्वरूप है भक्तिसूत्र का!शेष अगले अंक में!!
आपकी #सुतपा.....
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भक्तिसूत्र

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-४

#तो_बस_तुम_तो_लुट_जाओगी_उनके_उपर_कूर्बान #हो_जाओगी_तृप्तोर्भवति"

प्रिय सखियों तथा मेरे प्यारे सखा वृन्ध!!मैं पुनः अब आप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का चतूर्थ  सूत्र प्रस्तुत कर रही हूं।आप सबके ह्यदय में स्थित मेरे प्रियतम श्री कृष्ण जी के चरणों में इसके सूत्र-पुष्प को चढा रही हूं--

#यलब्ध्वा_पुमान्_सिद्धो_भवति_तृप्तो_भवति।।४।।

मेरे प्रियतम की प्यारी सखियों!!"प्रसिद्ध सूफी फकीर "फिरदौसने कहा है कि--
#चाह_मिटी_चिन्ता_गयी_मनुवाँ_बेपरवाह।
#जिनको_कुछ_नहिं_चाहिये_वे_शाहनपति_शाह।।

मैं सबसे पहले आपको 'पुमान्"का अर्थ बताती हूं---पुमान् अर्थात बुद्धिमान!!बुद्धिमान तो वही हो सकता है जो अपने जीवन के ध्येय,लक्ष्य!! को प्राप्त करने के लिये सतत् गंभीर हो ,प्रयासरत हो।

हे प्रिय!!मैं देखती हूँ कि किसी को अप्सरा, किसी को यक्ष,गंधर्व,भैरवी,काली,कर्ण पिशाचिनी आदि आदि सिद्ध करनी है!!ये सब क्या है ? नर्क में जाने का,अपनी अधोगति का मार्ग खोलने की आत्म घातिनी ईच्छायें हैं ये!!मेरे प्यारे!! "भैरवी" कोई स्त्री नहीं हैं,अप्सरा कोई सुँदरी नहीं हैं,काली कोई देवी नहीं हैं!!

ये तो आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में आप देखें तो दिव्यतम् साधनायें हैं!! आत्म-सिद्धि के द्वार खोलती ये विधायें हैं!!यदि आप इन्हें किन्ही मानवीय कल्पना में उतारने का प्रयास करते हैं तो इनकी आध्यात्मिक ऊर्जा विकृत् रूप धारण कर आपका भयंकर अहित ही करेंगी!!

और जीवन का श्रेष्ठतम लक्ष्य तो वही हो सकता है कि जिसे प्राप्त करने के बाद हमारी ये भौतिकीय अंधी दौड़ खत्म हो जाये,- "इटली"के एक धनाढ्य सेठ थे!!युवा!!वे नयी नयी लडकियों से शादी करते फिर दूसरी से करते यही शौक था उनका!!

एक बार एक सुंदर सी लडकी के पीछे सालों घूमने के बाद वो राजी हुयी!!बहुत से मित्रों के साथ चर्च में दोनों गये उसे अंगुठी पहनायी !!इतने में क्या देखा कि एक बहुत सुंदर लडकी पीछे खडी है!! वो अपनी नयी नवेली कूँवारी पत्नी को छोडकर उसकी तरफ भागे!!बाद में किसी ने उनसे पूछा कि इतनी मुश्किल से यह मिली थी!!फिर भी तुरन्त दूसरी के पीछे क्यों भागे ?

तो उन्होंने कहा कि ये तो मिल ही गयी--अब इसमें कोई आकर्षण नहीं बचा।

सांसारिक सम्बंध या पदार्थों का आकर्षण ऐसा ही होता है--यदि मिल गया तो फिर उससे मन भर ही जाता है बहुत ही जल्दी!!लेकिन ऐसी प्राप्ति!!कि जिसके मिल जाने के बाद,और कुछ भी मिलने की ईच्छा ही न हो!और हे प्रिय!!यही है #सिद्धोभवति"
जैसे कि मीठे निर्मल जल का महासागर यदि मिल जाये तो!!कूप तालाब की जरूरत ही समाप्त हो जाती है!!

ऐसे ही यदि एक बार!!मेरे प्रियतम से प्यार हो गया न!!उनके श्री चरणों से भक्ति हो गयी न!!!
तो बस!!!तुम तो लुट जाओगे! उनके उपर कूर्बान हो जाओगे!! #तृप्तोर्भवति"

हजारों हजार जन्मों की प्यार पाने की भूख हमेशा- हमेशा के लिये विश्रान्त हो जायेगी-हे प्रिय!! #तृप्ति अत्यंत ही मनमोहक ,लुभावना किंतु रहस्यात्मक विशेषण है!! मैं आपको कहूँ तो पती-पत्नी आजके युग में ही क्या सतयुग में भी यदि एक दूसरे से संतुष्ट न हों तो वे कभी #तृप्त भी नहीं हो सकते!! मुझे ऐसा लगता है कि तृप्ति भीतर से आती है!बाहर से कभी मैं तृप्त हो ही नहीं सकती!!

संसार के सभी पुरुष अथवा सभी स्त्रीयाँ,समूचे ब्रम्हाण्ड का ऐश्वर्य, इन्द्रपद पाकर भी!इन्द्रों को तो अहिल्या ही अप्सरा लगेंगी,शचि और अहिल्या हों अथवा मेरे जैसी कोई कुरूपा और आपके जैसी कोई अद्वितीय अनिंद्य सुँदरी!! हम सभी स्त्रियोंकी बाह्य शारारिक संरचना तो एक जैसी ही होगी ?

बस जैसे किसी ने सुँदर कोमल, युवा और गोरी चमड़ी से और किसी ने काली,विकृत और वृद्ध हो चुकी चमड़ी से इस नारी-शरीर के अस्थि- पिंञ्जर को ढँक लिया होगा!! हे प्रिय सखा वृंद!! किसी अंधकार से ब्याप्त शय्या पर चाहे अनुपम लावण्य-मयी सुँदरी हों अथवा कोई अतिशय कूरूपा!!उन दोनों में आपको वासना की आँधी जब आती है तो कोई भी भेद आप नहीं कर सकते!!और उसका भी कारण है!!हे प्रिय!

#वासना_की_आँधी_तो_समुद्र_के_ज्वार_भाटे_की_तरह_आती_और_जाती_है!!

ये तो मोह है!शारीरिक संरचना का आकर्षण है, वासना की आग है यह जलाती है और भक्ति तो प्रेमा है,यह तो #तृप्त कर देती है,शीतल कर देती है!! हाँ सखी यही प्रेम-स्वरूपा भक्ति है!!
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भक्ति सूत्र ~३

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भक्ति सूत्र

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-१

#ये_स्त्री-पुरुष_का_जो_चोला_है_ये_तो_एक_छलावा_है
मेरी प्यारी सखियों!!वैदिक साहित्य की मर्मस्पर्षी श्रँञ्खला के अन्तर गत मैं आज से आप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र की स्वलिखित बाल-प्रबोधिनी प्रस्तुत कर रही हूँ!!आप सबके ह्यदय में स्थित मेरे प्रियतमजी श्री कृष्ण जी के चरणों में इसका प्रथम सूत्र-पुष्प चढा रही हूं--

#अथातो_भक्ति_जिज्ञासा।।१।।
सखियों!!कभी कभी आपमें बहुत से पुरुष,साधू, सन्यासी,सोचते होंगे कि मै लगभग हमेशा  आप सबको---#सखी_क्यूं_सम्बोधित_करती_हूँ,!!
लेकिन वो तो मैं करूंगी ही, क्यों कि!!एक मेरे पिया!! जी ही अखिल ब्रम्हाण्ड में पुरुष हैं और बाकी हम सभी उनकी सखियाँ!!

ये हो सकता है कि मेरी भौतिकीय संरचना स्त्री की और आपकी पुरुष की है,किंतु ये स्त्री-पुरुष का जो चोला है,ये तो एक छलावा है!न जाने कितने जन्मों  में !!मैं!! आप!!स्त्री-पुरुष बदल बदल कर बने होंगे, अरी!!मैं तो यह भी नहीं जानती कि कितने जन्मों में मैं शूकरी,कुतिया,बंदर,कीट, पतंगा,बिच्छू ,विष्टा की कृमि,छिपकली,वृक्ष,तृण, कदम्ब,बिल्ली,नागिनऔर भी न जाने क्या-क्या बनी होउँगी,लेकिन उनके और उन जन्मों के संस्कार!!! मैं तो अपने लिये यही कहूंगी कि----

#कुतिया_से_हिरनी_बनी_हिरनी_से_बनी_गाय।
#गाय_से_ब्राम्हणी_बनी_पर_जाति_स्वभाव_न_जाय।
कल मेरे किसी निबंध पर मेरे एक मित्र ने प्रश्न भी किया था कि-क्या शुद्र!!! कभी  किन्हीं कर्मों से ब्राम्हण बन सकता है ?
तो हाँ!!मैं नहीं-भक्ति सूत्र यही कहता है कि ,हाँ!!वह बन सकता है। और यह धीरे धीरे आगे यह स्पष्ट होता भी जायेगा।

#अथातो_भक्ति_जिज्ञासा मानव जीवन का मुख्य उद्रेश्य ही यही है,प्यारी सखियों!!एक बात कहूं!! भक्ति" स्त्री वाचक है---यही तो ज्ञान,वैराग्य,जिज्ञासा, योग जैसे बालकों की जननी है-
#प्रभू_कृपा_तब_जानिये_जब_दें_मानव_अवतार।
#गुरू_कृपा_तब_जानिये_जब_मुक्त_करें_संसार।।
न जाने कितने जन्मो के सद्कर्मों के परिणाम स्वरूप मानव का जन्म मिला !!!और फिर इसमें भी!!!  #मा_नव=नयी नयी कोखों में ही जाने की तैयारी आखिर क्यों करती रहती हूँ मैं ?

#पुनरपि_जननं_पुनरपि_मरणं,
       #पुनरपि_जननी_जठरे_शयनं।
#इहू_संसारे_खलु_दुश्तारे,
        #कृपया_पारे_पाहि_मुरारे।।
तो प्रिय सखियों!! #आहार_निद्रा_भय_मैथुनश्च

निद्रा,भोजन,संभोग,भय!!ये सब तो हममें ही क्या !!पशुवों में भी है,यही तो  "दिब्य ऋषि नारद" जी कहते हैं कि अगर तुम अपने को #मानव मानते हो !!!तो !!तुम्हारे में भक्ति कैसे प्रकट हो  ?भक्ति है क्या ?
यह जिज्ञासा अवश्य होनी चाहिये,और इस जिज्ञासा के जागने की पहली शर्त है पुरुषत्व-स्त्रित्व के अभिमान को छोडकर--- आओ मेरी सभी सखियों तथा प्रिय सखा वृंद,मेरे साथ!! हम सब पहले  #नारी_न_अरी_बन_जायें_शत्रु_हीन_बन_जायें
यही इस सूत्र का भाव है... #आपकी_सखी_सुतपा!!
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अपनी सांस्कृतिक विरासतों को अक्षूण्य रखने के प्रयासान्तर्गत आपके लिये मैं एक उपहार आज प्रस्तुत कर रही हूँ!! मेरे प्रिय प्रियतमजी तथा प्यारी भारत माँ के श्री चरणों में यह वेबसाइट प्रस्तुत करती हूँ!!आप सभी से आग्रह है कि इस दिये गये लिंक पर क्लिक कर वेबसाइट को #लाइक करते हुवे अपनी अमूल्य टिप्पणियाँ अवस्य ही देंगे--